बनारसी बाई | Banarasi Bai

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Banarasi Bai by विमल मित्र - Vimal Mitra

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about विमल मित्र - Vimal Mitra

Add Infomation AboutVimal Mitra

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
बनारसीयाई २३ कहकर जो साहब कभी नहीं हँसते थे वही साहव पूव हँसने लगे । शेकहैंड करने के लिए शायद आगे बढ़े । मुखर्जीगिन्नी दो कदम पीछे हट गईं। हेंसते-हँसते बोली--अच्छा चलूँ साहव, नमस्कार-- साहव ने भी दोनों हाव ऊँचे करके ममस्कार किया । अगले दिन मिसेज प्रेमचानी को यह बात बताते हुए हँस पडो थी जोर से मुखर्जीमिन्ती । बोली थी--क्या मुश्किल है दीदी, साहब ने आगे हाथ बढ़ा दिया-- घर आकर कपड़े बदलने पड़े फिर से-- --#यों, कपड़े क्यों वदलने पड़े वहन ? --बदलती नही ? उनकी भी कोई जात है ? मूअर, गाय क्या नहीं खात्ते ये लोग । उस दिन भुधर बाबू भी आश्चर्य चकित हो गये । मुखर्जी वायू ने कहा--सत्यनारायण की कथा है, जरूर आइयेगा बड़े बाबू-- “-सत्यनारायण की कथा ? क्‍या कह रहे हैं ? आपके घर ? “हाँ होती तो हमेशा है, पर कभी सबको बुला नहीं पाया । “+हमेशा होतो है ? पुरोहित कहाँ से मिलता है ? बड़े बाबू ने पूछा-+ भ --कंदनी से लाता' हूँ । मुखर्जी बाबू ने जवाब दिया । --कटनी से पुरीहित लाते हैं ? मुखर्जी बाबू बोले--वो तो लाना ही पड़ता है। यहाँ तो कोई मिलता नहीं । भूघर बाबू ने पूछा--काफी खचे पड़ जाता होगा ? कितना हो जाता १ ह मुखर्जी बाबू ने कहा--पुरोहित को सवा पाँच रुपये दक्षिणा के देता है “-भवा पाँच झुपये ? --धवा पाँच रुपये भी न मिलें तो कटनी से कोई आयेगा ही क्‍यों ? दो दिन तो खराब होते ही हैं उसके यहाँ आने में । फिर यहाँ उसका रहना, खाना, मैवेंध भादि वो है ही-- 1




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now