भारत - भारती अतीत खंड | Bharat Bharati Atit Khand

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Bharat Bharati Atit Khand by मैथिलीशरण गुप्त - Maithili Sharan Gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अतीत खण्ड १५ ख्री ने कद्दा सर्योदय ही न होगा ! उसके पातिय्रत घर्म के प्रभाव से हुआ मी ऐसा ही | सूर्यय का उदय दोना रुक गया । इससे यढ़ी इलचल मच गई । अन्त में अनसूया देवी ने उसे समझा घुझाकर सय्यं का उदय करवाया । सूयोदय होते ही फषि का झाप फलीसूत हुआ, बढ ब्रासण मर गया । किंन्द जनदया ने अपने प्रमाव से उसे पिर जिला दिया और उसे नीरोग भी कर दिया । ( ख) एक योगी चन में यूक्ष के नीचे येठा था । सदसा दो कौर्चो ने उसी दक्ष पर काँव काँव मचाकर उसे प्रुद्ध कर दिया । उर्यो हो उसने अपनी तीकष्ण दृष्टि ऊपर की ओर डाली, स्यों दी वे दोनों पक्षी मरकर नीचे गिर पड़े । अपना ऐसा प्रमाव देखकर योगी को गर्व हुआ । एफ चार उसी योगी ने किसी गाँव में लाकर एक ग्दस्प के द्वार फ्र भिक्षा के लिए आवाज दी । भीतर से ख्री-कंढ से उत्तर मिला, “जरा देर ठदरो” योगी ने कद्दा--हैं, यद अमा गिनी स्री मुझे ठ्दरने को कदती है, मेरे योग्य फो नहीं जानती ! अभी चह्द यद सोच ही रद था कि अन्दर से फिर जावान आाई--'येटे, बहुत फ्रोघ मत कर, यहाँ फीए महीं रदते ।” अजय तो योगी फके आधे का ठिकाना न रद्द । ररी फे याएर आने पर वह उसके पेरों पर गिर पढ़ा और एूएने लगा कि मां तूने यए सब कैसे जाना ! हरी ने फददा,-'मैं एफ साधारण सी हूँ; किन्द॒ मैंने इमेशा अपने धर्म का पालन किया है | अमी जय मैंने वर्ग ठदरने को फद्दा था तय मैं अपने रुग्ण पति की सेवा में लगी हुई थी । पतिऐया ही सेस धर्म है । सपने धर्म्म फा पालन करने से मेरा टृदय इतना निर्मछ होगया है दि उसमें सब बातें प्रतिदिश्यित हो जाती हैं । यदि नुग्द्ें इससे लिया सन! फी इच्छा ऐ तो अमुर व्याप के पास डाओ 1” उस ररी के उपदेशानुरार यए योगी उस स्याप के पास गया बर ब्याष ने उसे सनेक सारग्मित उपदेश दिये । द््टी उपदेश “स्‍्यापगीता” के माम से प्रॉटद् हैं ।




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