आपस्तम्बधर्मसूत्र का समीक्षात्मक अध्ययन | Apastambadharm Sutra Ka Samikshatmak Adhyayan

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Apastambadharm Sutra Ka Samikshatmak Adhyayan by हर्षवर्धन - Harshavardhan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वह भी अनेक शताशब्दयें कौ अनवरत परम्परा का बारिपाम है । सूत्र साहित्य में कल्पल्नत्र प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के ज्ञान के गलए अत्यधिक महत्वपूर्ण है । कल्प कोर केदा ड़, ग” के अन्तंगत रषौ गण हे । चरणव्यूह के अनुसार शिका, कल्पे, व्याकरपं ¶#नरक्तं एन्दो. ज्योतषम्‌ पे वेदाङ्ग है । आपस्तम्५ ने इन्हे इस क्रमम्‌ गगनाय हे + षड्डगो वेद: । हन्दङकल्मोढ व्याकरणं ज्योत निरतं शीश्चा च्छन्द 7¶ववतीरत ।। {2/4/8/10~1 1 ! कल्ष सचसे पूर्ण वेद ड़ हें, इसमे अर्नर्तगत सूत्रों का ¶व्शात भण्डार समाहित है । कल्पः का अ है वेद में पिरवाहित कर्मों का क्मपूर्वक व्यवस्थित कल्वना करने वाला शास्त्र कली वेद †वीट्तानां कर्मणामानुपूर्वपा कल्पना -श सत | पलत: भरन यज्ञ यागादि का #ववाहोषनयनाद्दि क्म का गवीशण्ट प्रितिपादन वेदिकं ग्रन्थं मे शक्या गया है । उन्हों का क्रन्द वर्णन करने वाते सूत्र गन्धी का सामान्य अभिभिधान कल्ब ह । कल्वसुत्र अपने #वघ्य प्रपितषादनं मे ब्राद्मपं ता ति णिः पवि तानिति तिकि मनिः कोः विनि तिकि शितिः सि विनः पिति निः पिनि तिति जि विति जनिरिति ननि मिति म ति विः ति निति पिति सतित चि ननि यतानि सिता मि मिः तिति मि पि तिति तिति आतिः ममः । . न्विष्पित्र- ग्वेद ~प तित्ात्य कौ वम॑द्‌तष वुत्त प 13




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