श्राद्ध विधि | Shradh Vidhi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नमः श्रीसर्वक्ञाय । श्री वि से ९९ पत्न श्रीपरमेष्टिनः प्रदद जी प्रोचेगरिछात्सताम ॥ द्घा पद्म सुपवेणां छ्लिंखरिएः प्रोदाममाहात्म्यत- श्रेतश्विन्तितदानतश्च द्ंतिनां ये स्मारयन्त्यन्वद्म्‌ ॥₹॥। जे, पंसितोने पोतानी लोकॉत्तर स्टोटाइथी देवताना पांच सेरुने झने मनोवां ठित वस्तुना दानथी पचि कब्पद्वद्योले निरंतर याद करावे दे, ते यराकीत्तिना स्थानक श्रीछरिदूंत; सिर; याचाय, उपाध्याय छने सुनि- वर्य; ए पंच परमेष्टी छ्ञाराधकदएवा चव्य जीवोने घणी श्रेष्ठता छ्यापो, ॥१॥ हुवे टीकाकार मंगलाचरण प्रू्ण करीने व्यागल झुं करवाजुं वे ते कहे दे, ( आया चृत्तमू- ) श्रीवीरें सगणाघरं, प्रशिपत्य श्रुतगिरं च सुणुरूंभ्व ॥ विठसोमि स्वोपह-श्राइविधिध्करएं किंचित ॥ ए ॥ लगवान्‌ श्रीमद्ावीरस्वामी, गोतमादि गणघरो; श्ुत्तताणी ( जिनजा- पित्त सिद्धांत ) ने वन्नीश झुणना धारक एवा सहारा सझुरु ए सर्वने जावथधी चंदना करीने पोते रचेला “श्राद्विधि' घकरणनी सेडामात्र व्याख्या करूं दूं. ॥ ४ ॥




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