मानस पीयूष बालकाण्ड खण्ड - 2 | Manaspiyush (balkand Ii)

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Manaspiyush (balkand Ii) by अंजनीनंदनशरण - Anjani Nandan Sharan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विषय . दोहा खरमरु ८४ गंधवके दो भेद, प्रधानोंके नाम ६१ गणेशपूजन - १०० गत ४९ गहगदे १५४ गाना, गावा, गाई ४५, ११८ गाली विवाहकी ९९ गिरापति १०१ गिरा सुदाई, गिरा गम्भीर ५७ गिरा ८ बर गिरा ) १७४ गिरिजा ७६ गिरिदुर्ग १७८ गिरिनाथ ४८ गिरी ५५ गीतके भस्राणायः 1४८ জীব मानसके असुर मारि 1१२१ का मिलान १९१ गुण चौदह ६७ गुण ( राजाओंके छः गुण ) १५३ गुणखानि १४८ गुणगानमें कथा और भक्ति दोनों आ जाते हैं ४८ गुण दोष, दोष गुण । ६६, १३० { दिन्य ) गुणोंकी दो-अवस्थाएँ, व्यक्त ओर अन्यक्त ११६ ( साच्विक ) शुण जीवको मायासे हुड़नेवाले हैं. ११६ गुण आत्मारामको भी खींच ठेता है १६४ गुद ৮৮ ८० गुरुके वचनपर दृद विश्वास चाहिये. ८० » की अवशाका फल दुःख है ८० » की दर्जा माता-पितासे ऊँचा ७७ गुरुजनोका आदर न करने वा अपमान ` ` करनेसे आयु, श्री आदिका नाश १२८ गुरुजनोका वचन रिरोधायं करना | चाहिये ` १३७ गुरु सुर संत पितृ विप्र ( प्रण्चदेव ) १५५ যাহা ; १२५ [ १८ ] न्वौपाई छ्न्द्‌ (१) (७) (४) (४) छन्द (४) (४), १८६ (४) (८) (१) (६) (८) (१) ( १-४ ) (३) ` (५) विषय दोहा रूट्‌ गुण ४७ गोतीत १८६ गोसाई ५६ गोस्वामी वलसीदासजीका दृष्टिकोण ओर भावना ४९ गोस्वामी तुखसीदासजीकी হীন্তী-_ (१) जहाँ विशेष माघुर्यका वर्णन आता है वहाँ सून्रधारकी तरह साथ ही चचौपाई (४) छन्द्‌ २ (२) (७) रहकर छेयं भी दिखा देते हैं ४९ (५-६), १४४ (४) जहाँ सगुणमें भ्रम सम्भव है वहाँ एेशये-वाचक अगुण, अखण्ड आदि विशेषण देते हैं (२) पाठकको बराबर सावधान करते जाते हैं जिसमें वह भगवानको मनुष्य ने समझ ले! मनुष्य समझना भारी प्रमाद और भव- सागरमें|डालनेवाला है (३) जो बात कहीं फिर लिखनी आवश्यक है उसे दोनों जगह न लिखकर केवल दूसरी जगह लिख देते हैं (४) जब्र कोई बात'दो या अधिक जगह लिखनी है तो प्रायः उसका कुछ अंश एकं जगद ओर कुछ दूसरी जगह किख देते ह । पाठक अर्थ लगाते समय सबको सर्वत्र समन ठे ८५) प्रसिद्ध कथाओंको बहुत संक्षेपमें कहते हैं (६) जिस विषयको एकसे अधिक बार लिखना है उसे प्रायः एक प्रधान स्थानपर लिखते है ओर अन्यत्र वही वर्णन वहाँ के दो एक शब्दोंसे जना देते हैं (७) महाकाव्यकछा और नाठकीय कलाका एकीकरण कर दिया है जो पाश्वाच्य कवियोंकी असम्भव प्रतीत होता था. ४६ १४४ ४९ 5६५ ६५ ९४ ( १-४ ) (५-६ ) (५६) ( ३-४ ) (४) (२-३ ) (६-८ )




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