सभ्यता का इतिहास भाग 1 | Sabhyata Ka Itihas Bhag-i

Sabhyata Ka Itihas Bhag-i by सर रमेशचंद्र दत्त - Sr Rmeshchandr Dutt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रे ड ६९ सदा वसाया है और प्रत्येक क्राल के मुरय मुख्य विषयों को रुपए रूप और पूरी तरद से वर्णन करने कान्डद्योग किया है। उन सु्य मुख्य घटनाओं को-अर्थात्‌ दिन्दू सभ्यता की कथा की प्रधान श्रातां को-अपने पाठकों के हृदय पर याड्टित करने के लिये ऊदा कहीं पुनरुक्ति वी झावइयकता पड़ी है चहां मेंने पुन्क्ति को बचाया नहीं दै। सस्कत ग्रन्थों के अनुचादो से जो बहुन से वाक्य मेंने उद्धुत किंए हैं चे पहले पद मेरे अविस्तृत घर्णन के सिद्धान्त के विष्द्ध ज्ञान पढेंगे | परन्तु इन उद्धत चाक्यों का देना बहुत दी उचित था क्योकि पदिले तो ऐसे घिपय में जिसमें कि यहुत सी भिन्न सिन्न सम्मतियां हो सकती हैं यदद नितान्त आवएयक है कि दम अपने पाठकों के सन्सुय उन मुख पाठों थ्को उपस्थित- कर दें कि जिनके जौघार पर मैंने अपनी सभ्मति स्थिर की दै जिसमें कि पाठक लोग उस पर स्यय पिचार कर सके शौर यदि मंने जी सिद्धान्त स्थिर किए हूं उसमें भूल हो तो उसे सुधार सकें । दुसरे हमारे प्राचीन अ्रन्थकारों के मूल ग्रयों से पादकों को परिच्चित कराना ऐतिहासिक विद्या के लिये लाम दायक होगा। यह आशा नहीं की जा सकती कि कार्यव्यप्र विद्यार्थी इन प्राचीन और फठिन प्रन्यौ के सूल पाठ को अधषा उनके पाणिडत्य पूर्ण श्रनुवादौ को पढने का समय निकाठ सकेगा और चह इतिहासकार जो श्रपने पाठकों का इन प्राचीन प्रन्थों के कम से कम कुछ मागों से परिचय कराया चाहता दो पद इस चिपय में झपने पाठक्रों की फिसतों बढावेगा | और अन्त में यदद ठीक कहा गया हैं कि विचार ही भाषा । हैं और मापा दी विचार हैं। अत यदि कोई इतिदासफार घायोन समय के घिचारों को पराट किया चाहता हो-यदिं घदद यद बतलाया साहता दो कि प्राचीन समय के हिन्दू ठोगों के विचार अर विश्यास कैसे धे-तो उसके लिये इससे झरदी कोई वात नदीं होगी ।. कि घद्द उन शब्दों को उद्धत करे जिनके हारा कि प्राचीन समय के सोगी ने झपने विचार प्रगट किए है। अत्त धन थोड़े से घाफ्यो को यज़ुत कर दने स पाठक को प्राचीन हिन्दू समाज उनके चाछ ध्यघह्दार झोग उनके चिखारों का जितना शान हो सकता हैं उतना यदि मि उसका पूरा बिस्तुत यणन लिख तो उससे भी मदीं दोगा 1 व




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