अरे यायावर रहेगा याद | Are Yayavar Rahega Yaad

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Are Yayavar Rahega Yaad    by सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन - Sachchidananda Vatsyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हते हूं कि सृप्टि की सर्वोत्तम आछृति चक हे क्योंकि उस का भादि-बन्त कुछ नहीं हू । मेन देश की भिन्न-भिन्न सेंकरी-चौड़ी, कच्ची-पवकी, ऊबड़- सावड़ सड़कों पर लुढ़कते-पुढ़कते अनेकों बार सोचा है. कि. चक्नाकृति में सौन्दर्य के लिए वहुत अधिक: नम्बर चाहे न. भी पाऊँं, अपनी आदि-अन्तद्दीन गति-क्षमता का दावा तो कर ही सकता हूं-और यह भी कह सकता हूं कि स्वयं सुन्दर न हो कर भी में संसार के अखिल सौन्दर्य की नीव हूं, क्योंकि में सस्कृति की नीव हूँ | संस्कृति और सभ्यता के विकास में अग्नि के अवतरण के वाद जो दूसरी सीढ़ी मानव प्राणी चढ़ा, चह में हूँ या यों कह लीजिये कि देवताओं के समुद्र-मन्यन से जैसे सर्वश्रेप्ठ उपलब्धि अग्नि की हुई, उसी प्रकार मानव-मन-रूपी महासागर के मन्थन से जो श्रेप्ठ नवनीत प्राप्त हुआ, वह है चकाकार की उद्भावना. . . यह में कह रहा हूँ, तो चक्र मात्र के साधारण प्रतिनिधि की हसियत से; नहीं तो व्यक्ति रूप में में एक अकिचन यायावर हूँ, और अपने ही जैसे यायावर श्री इन पंक्तियों के लेखक जी' का सहारा--क्योकि में उनकी गाड़ी का एक टायर हूँ. « - गौर में जो राम-कहानी' कहूँगा, वह भी मेरी राम-कहानी इसी लिए हैं कि वह मेरे चालक की कहानी हूँ । अपने अनुभव को दूसरे के--अपने मालिक के--इतिवृत्त के रूप में कहना ही तो मर्यादा-संगत है; बैष्णव- भक्त राधा और कृष्ण के जीवन में अपने राग-विराग ढाल देते थे, में अपने प्रतीक-पुरुप को ही आधार बनाता हूँ । तुलना आपको वड़वोलापन लगे तो यह न .भूलिये कि जैसा मुरीद होगा, बसा ही पीर होगा, छस से वड़ा,कहाँ से मायेगा ! : ., * .. , हि । , थ कल हीना निकाय, नह पक. ला




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