भुवि भूषण भरत | Bhuvi-bhushan-bharat

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Bhuvi-bhushan-bharat by उर्मिला किशोर - Urmila Kishor

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सुखी मै यहाँ आयं-पद साथ में है. कि तन यह मुझे घर सद्ृश ही सुखद है । सुवत्सल पिता श्री बहुत ही दुखित हैं पुखी वे रहें तात सदुपाय करना । ५ लखन से संदेगा नहीं कह सका मै वहुत भुब्ध उद्विग्न से वे दिखे थे | कि वट वृक्ष का दुग्ध ले युग तनय ने जटाये. तपस्वी सदृश फिर बनाई | रहा मैं खड़ा देखता ही. कठिन उर चली राम की नाव तब तक वहाँ से । निषादों का स्वामी गया साथ में था सुपरिचित रहा मांग के गहवरों से । सुप्रभु राम जब नाव में जा रहे थे निरालम्व निरुपाय मैं हो गया था । कहा ग्रह सचिव का गला भर गया फिर विरह से विकल नृप अचेतन हुये थे । किया. कौसिला ने. सदुपचार उनका गई चेतना कुछ क्षणों को फिरी थी । रही दीप की दीप्ति अन्तिम क्षणों की कि वह ज्योति निर्वाण अब चाहती थी । १६ भुवि-भूषण-भरत |]




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