लखमा की आँखे | Lakhma Ki Aankhe

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १३ सच कहता हूँ प्रत्येक वस्तु के अंत को शाइवत सानने वाला मैं भी थर्रा गया । श्राज बहुत दिन बाद सोचता हूँ कि यह तो रह है संभवत यह वस्तु के किसी भी रूप. की इकाई की भावना है । जिस प्रकार यह श्रपनी रक्षा करने की चेष्टा करती है संभवत उसी सिद्धान्त पर यायावर ब्रह्मारड भी अपने को बचाता है क्योंकि मैं ब्रह्मारड का एक श्रंश हूँ उससे श्रलग करके नहीं देखा जा सकता । काठ जो इतनी कठिनाई . से कटता है वह भी वस्तु का स्वरक्षा के लिए संघर्ष है श्र पत्थर जो बहुत ही कड़ा बन जाता है वह उसका अपना प्रयत्न है । ्रभी मैं यह सब निरंय भी नहीं कर पाया था कि वन में जलती मशालें चलती हुई दिखाई देने लगीं । उनको देखकर मुझे लगा कि वहाँ ब्रह्राक्षसों का कोई निवास था तभी वे उल्काएं जगमगा रहीं थीं । यह भी संभव हो कि वे कापालिक हों जो नरबलि ढूँढने निकले हों । मैं तो हृतचेत- सा देखता रह गया । केवल इतनी ही सतकंता सुभमें कोष थी कि वे कोरी क्या कर रहे हैं यह देखता रहूँ । रे बापरे एक ने कहा । वे हमें वन में हू ढने आझारहे हैं । बस सुनने की देर थी कि वारहों श्रादमी लाश को वहीं छोड़ कर जिसको जिधर सूक्ता उधर ही भाग निकले । मैं भ्रकेला रह गया क्योंकि सेरा साथी एक शव ही था जिसे लहू ने भिगो दिया था कितु वह न मेरी तरह हिलता डुलता था न साँस ही लेता था । उसके लिये तो सब कुछ हो. को




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