प्रकरण रत्नाकर | Pakarn Ratnakar-aadayatmsar

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Pakarn Ratnakar-aadayatmsar by भीमसिंह वेदालंकार - Bhim Singh Vedalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आठ इष्टिदी सऊाय वालाबोध सहित- शण्छअर्थ ॥ कूदादि आठ दोप तथा रागछेप, कामक्रोघ, सदह॒पे, तेनो नाश करे. वली अतत्त बुझिने तजवायी, पकृष्ट रुचिमार्गे, तत्त श्रद्धानादिकर्ां तृप्ति पामे, कृतापराघजन उपर पण क्रोधनी मंदता होय अने तेनुं पतिकृूल न चिंतवे. समता ज्ञाव होय, तत्वसार्गरूप घर्स व्यापारनों संयोगी द्ोय. बेर विरोधनों नाश करनार होय, पाप प्रवृत्ति थछजतां पश्चात्ताप करे. तेनी बुझ्ििएवी होय के शर्तनरा के० सेंकमो मजुप्योनी आजीविकाने लाज़कारी होय, इत्यादि योग आठ दोप गयाथ्री स्वाजा- विकरीते जपजे ॥ ३ ॥ चिन्हयोगनारे जेपरम्ंथमां ॥ योगाचारयदिछ्ठ ॥ पंचमह्टी थकीतेजोडीए ॥ एढ्वातेहगरिछठ ॥ धनए ॥ ४ ॥ धर्थ ॥ वल्ली योगनां चिन्ह के० लक्षणों श्रह्मचर्यादि कृतप्रतिक्षा निर्चाह, अपाय निराकरणादि जे पातंजलादि योगाचार्ये सवागे दीठां ठे, ते सर्व पंचम दृष्टिमां होय, अर्थात्‌ पूवेनी चार दृष्टियी अधिक शणेयुक्त गरिष्ट बुद्धि होय- तेज कारणथी मोहनो क्योपशस जे गंयिन्नेद ते अ्ही कद्यो ठे ॥ एति थिरा दृष्टि विचार ॥ ४॥ ठ्ष्टीदिप्रिदवेकांताकहुं ॥ तिदांताराज्प्रकाश ॥ तत्त मिमांसारेहढढ्ोयेघारणा ॥ नढींअन्यश्र॒तवास ॥ घन० ॥ ०॥ अर्थ ॥ हवे ठठी कांतानामा दृष्टि कहीये ठीए. आ दृष्टिमां आकाशना तारा स- रखो तत्तक्ाननो प्रकाश ढोय- जेम तारानो अज्नाव थतो नथी, तेम ते क्ाननो आ- ज्ञाव थतो नथी. त्लनीज विचारणा होय- तत्तउपर दृढ के० निविम धारणा होय, मिथ्याकप्रणीत श्रुतशासत्ननी लेश सात्र वासना न होय ॥ ५ ॥ मनमदिलालुरे वादलाडपरें ॥ वीजांकामकरंत ॥ तेम श्रुतधर्मेरे एड्मांमनधरे ॥ क्ानाकेपकवत ॥ धन० हद्दा। अर्थ ॥ जेस पतित्रता स्रीतुं मन पोताना बढावा स्वामी उपर, वीजा सर्वकास धरना करतां ठतां, जोडायेलुंज ढ्ोय तेस कांता दृश्विलों घाणी जो के संसारमां रहयो थको सर्वकार्य करे, तोपण तेत मन तो अ्तप्रणीत घर्ममाँज जोडायेल्लुं होय- संसारनां कार्यो उपर आसक्ति न होय अने ते सम्बग्‌ क्ञाननोज आक्ेपक के० आ- दरवाबालो होय ॥ ६॥ एड्वेक्ानेरे विधघननिवारणा ॥ जोगन्ीं जवदेत ॥ नविशुणदोषन विपयस्वरूपयी॥ मनगुण अवशुणखेत * तू




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