श्री जैन कथा रत्नकोष भाग-8 | Shri Jain Katha Ratnakosh Bhag -8

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Shri Jain Katha Ratnakosh Bhag -8 by

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न अस्तावना या बन क ग्थनों आउमो ज्ञाग ढापी अमोयें अमारा सर्व साधर्मी सुझनाश्योनी समझमां मूकेलो के. जे नागमां सम्पग्रदष्टि समस्तस कनोने वांचवा योग्य एवो छुनिवरय पंमित श्रीरमविजयजी विरचित शोलमा तीयकर जे श्री शांतिनाथ नगवान्‌, तेमनो मात्र एक रास दाखल करेलो बे. कारण के जीवने उत्तम पुरुपोनां चरित्रो वांचवा्थी तथासांन लवाथी संसारनो निस्तार थाय ढे. आा रासना जूदा जूदा ब खंमो के, - मां श्रीशांतिनाथ जगवानना बारे नवनी सबविस्तर कथा आयावेली बे. तेमज वली श्री शांतिनाथजीना सुख्यगणधर जे श्री चक्रायुध तेमना पण सर्वेनवनी कथाउं थावेली के. था थंय एवो तो रमणीय के, के जेनी प्रत्येक ढालो,सरस एवा नव रसें करी संमिलित के,अने तेमां घएं करीने तो स्थलें स्पलें वेराग्यकारक लपदेशोज आवेज़ा ढें, के जेने ध्यान दइनें वांचबवाथी वाचकरद्ंदने संसारनुं प्रसारपणं समजाय डे. अने तेथी तेमना अंतःकरणना परिणाम सुधरे ढे, अने पढ़ी तेने सन्नतिनी श्रेणि प्राप्त याय ढे. वली था थंथर्मां वीजी पण चित्तचमत्कतिकारक मंग . कलश कुंमार,तथा सुमित्रानंदा दिक तथा पुष्यसार वगेरेनी अनेक कथा आवेली बे. तेमज वली श्रावकना वार ब्रतपरनी वार कथाउ॑ आवेली छे,तेलु, आदी अति वर्णन न करतां स्व नाइयोने हुं एटलीज जलामण करूं डूं, के ते सब कथालं तेल॑यें पोतेंज पोतानी मेलें वांची तेठु मे याथातथ्यस्वरुप बे, समजवुं. था रास, मुनिवय पंमित भ्रीरामविजयजीयें पंमितश्रीअजित प्रमस्‌रियें संस्क्त पद्ममां वनावेला श्री शांतिनाथचरित्र उपरथी रचेक्ो होय एम लागे बे. कारण के ते संस्कतंथ घने आ ग्रंथ ज्यारें आपणों मेलवी वांचीयें ढेयें,त्यारें बहुशः बेहु यंचनी अक्तरशः वात मलतीज आवे बे, मात्र आ रासमां सहुने सारी रीतें समजी शकाय तेमादें वेराग्यकारक कथाउंमां तथा केठलाएक कठिनज्ञागमां, यरत्किचित्‌ चरित्रभंयगत न ढतां वधारेल के. तथा एवीज रीतें चैत्यवंदन.स्तवन पण नवीनज बनावेजां बे. गरारासमां प्रसंगोपात एथक पथक्विरत *जोको तथा दोढा तथा सिद्धां ननी गायाउ॑ पण सीपेलीयो ते. वली आ यंथमां राद्दाजुप्रास तो एवा उत्तम :




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