कर्णपर्व | Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Karnava Parva

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४&5&&&&&७७७४७७&७७७७६७७६७६७८७७७६७७६७७७४०७७) शर ५ 'कणप्र । प्रथमेषध्यायः ॥ १ ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीवेदब्यासाय नमः ॥ नारायर्ण नमस्कृत्य नरं चेव नरोत्तमम्र्‌ । है। देवीं सरस्वती चेव ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ १॥ वैश्म्यायत उब्राच-तंतों द्रोणे हते राजन्दुर्योधनमुखा न्रपाः भूशमुद्धिन्नसनसों द्वोणपुत्नमुपागसन्‌ ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलामिहतोजसः पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारहतीसुतम्‌ ते मुहूर्त समाश्चस्य हेतुभिः शाखसंमितेः 1 ॥ 1 पर 1 नए राग्यागमे महीपालछ स्वानि बेश्मानि सेजिरे ॥ ३ ॥ ते वेश्मस्वपि कोरव्य एथ्वीशा नाघुवन्खुखम । चिन्तयन्तः क्षय तीर दुःखशोकसमन्विताः ॥ ४ ॥ विशेषतः सूतपुन्नो राजा चैव सुयोधनः | दुःशासनश्व शक॒निः सोबलुश्व महावकः ॥ ५ ॥ उपितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने.। चिन्तयन्तः परिक्केशान्पाण्डवानां महात्मनाम्‌ ॥ यत्तदथूते परिक्षेष्ठा कृष्णा चानायिता सभाम्‌ । , तत्स्मरन्तो5नुशोचन्तो भृशमुद्दिश्नचेतसः | ॥ ७॥ बैज्ञम्पायन ने कद्य --ह्े राजा जनमेजय ) जब मदहाबी दे।णाचाय मारे गये तव अयन्त ब्याकुछ हुए- हुए राजा दुर्योधन, सब राजाओं को साथ छेकर,अश्व- (मम के समीप पहुँचे । मोद्द होने के कारण अत्यन्त ५ निश्तेज और द्रोण-बध दे; कारण अयन्त शोकाकुछ | सब छोग चारों ओर से उन अश्वत्यामा को घेरकर बेठ / कशककककककककककपकक कक कक कक कक कक कक 1 ७5222: 7 7 &&&७६७४४०७४७७७४७७७४६६# कि गये । शाख्रोक्त बातों से दुःख का वेग कम होने पर सब राजा ठोस राति के समग्र अपने-अपने टेरे में गये पहला अध्याय ॥ १ ॥ |. ॥१1३॥उस तीत्र जन-सहार की स्मरण ने वहां मी उनका पीछा नहीं छोड़ा | वे दु ख और शोक के कारण ब्याकुछ ये, रात्रि को करबंटें दी बदलते रहे। + कर्ण, दु शासन और मद्दारथी शकुनि ये तीनों उस » रात्रि को दुर्योधन के डरे में ही रहे | पाण्डों के। £ इनसे जो-जो महाक्लेझ पहुँचे थे उनका स्मरण इस ; समय इन्हें बेतरह भय दिखाने छुगा। झए में जनेक ( 1 प्रकार के क्लेश देने और द्वीपदी को सभा में बुक | 2 12004 27 क्‍क अर ४२००४२२२२२२८००२०:०४२४४०--७२०:००२२२००२-२२०२२२२०२२२२८०२२-२२२८२२८२-२२२२२८८-२२-०६२-२८८-२>२२->: ४ >>




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