हिन्दी विश्व कोश भाग 22 | Hindi Vishv kosh Bhag 22

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Hindi Vishv kosh Bhag 22 by नगेन्द्र नाथ वाशु - Nagendra Nath Vashu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बल आहादिन हुए और पुत्रका शन शत घ-ययाद भौर | याद दे कर कहने लगे, 'वत्स | तुम्दारा सवाध्धमें महूछ दे । तुम मेरे उस परम घेरी द्विशिरंजिनानकारी पापात्मा पुरन्द्रका मार कर और क्िद्शो का एकाघीभ्वर बन | प्ेरे पुनशाकसे प्रदीक्त ददयमैं शास्वियास्सि सिश्वन क रो। | सुम्र निश्चय चानना विश्विर मेरे मानसकेतसे कमी दृट ' दीं रदा है, बद्द सुशाल, सत्ययादी, निततेरिद्वय, तपखी, | और बेदविदोमें अप्रगण्य था। द्वाय मेरे उस गुण | यान प्रिय पुतका पापमति पुस्सदरने निरफ्राध हो मार डाला है। न य,ताघुर विताका इस तरद शाक्रकातरठापूर्ण घाफ्य | सुन फर इंद्र प्रति मन हो मन अत्यन्त फ्रोधित दे! | शीघ्र हो समरसझञा कर दटवलके साथ इस्द्रके। मारनेके , लिप चछा | निसम्तर दुन्दृसियेका निर्धोप और शाह नाद देने लगा। कापने छगी भीर देयदा मपमोत दे। माग ज्ञाने पर उद्यत | हुए । द्ेपराज भी चिरतन श्र के सन्निद्धित भान | आसन्न प्रिपदक्तो बराशक्रले भयभीत हुए भौर युट्धके | लिये सेनासप्रागमक्रा आयेज्न कर लेकपाए।दे। धघुला शध्रध्यूद (ग्रभपक्षोक्री तरद सेनानिय्रेश)-का रचनाके वाद | समरदी प्रतीक्षाप्ें खइई रहें। इधर ब,त़्ासुर भी नेजोसे सा यद्ा उपस्थित हुमा | दुयदानयो का तुमुलसप्राम होने । | असझ्य सेना निनादसे अमरायता | लगा | परस्पर विज्ञयका कामनासे यूतरासुर भौर बासय में घोर युद्ध धोने लगा । उस मयदूर युद्धानठफे प्रज्य रित द्वोने पर दैत्य प्रसक्ष दौर देवगण गिमर्ध भायका प्राप्त हुए। दतने एन्ट्रको सटसा क्यच भौर वस्तादि विर द्वित कर भपने मुखमें हाल लिया और पूर्व धेरताका हमरण ऋर हए्टखिरास मवस्थाय करने लगा । इसके घ,त्र द्वारा इस तरद निशृद्वीत द्वोने पर देवगण सतिशप कातर और लासित हो, द्वा इन्द्र | द्वा एग्ठ | | चिह्ाने छगे तथा दीन भौर ध्यधित मनसे सुरगुद घदद । स्पतिकरों प्रणाम कर सोने उनसे निचेदन डिया, “है द्विनेग्;त । आप द्रम स्वोके गुर हैं, ऐसा परामश दीजिये, जिसरी इस मरद्वापिपदु्से उत्ताण और उत्तासु एक हाथसे इस्ट्रकां छुटकारा हो। अमिवारक्रिया द्वारा उसका उपाय वीजिये। दिता इंद्धके हम समा नि्वद्ठ तथा दनोत्साद दो गये दे । ३ देवताओंंकी ऐसी कातरोक्ति सुन छुराचां््यने +दा,--- हू अमरगण [ तुम छोंग सदसा भयभीत न द्वो » देयराज य,बके मुख्दमें ज्ञा कर अवसान हुप है सही, किन्तु उसक कोष्ठप चीवित द्वो हैं। मतएवं ज्ञायितायम्थार्मे द्वो उसका निकालना उचित है। यह यात सुन कर देव ता्थोन इनकी मुक्तिका उपाय खोज्ञना आरम्म किया । समभोने गमीर चिन्ताक साथ मत॒णा कर मातम मद्दा सत्वसम्पाना जृस्मिका ( झँसाइ की सुष्ट को । इससे च,.वाछुरने भी जमाई ली। इस अउसरमें इन्द्र अपने शरीरफे सड्डु ,चित कर व,त्॒के मु दसे वार निकछे! इद्ने इस तरद्द वाहर निकल फिर उसके साथ अयुत चर्षधश्यापा निदारुण छोमदर्भण भांपण सप्राम जारी क्िया। पीछे ज्बव यरमदसे मच घूलत्नासुर क्रमश रणम यद्धित होने लगा तब उसे तेजसे घर्चित भर पराजित इस्ट्र गत्यन्त प्यथित द्वो रण छोड भागे। सुरपतिक्रों मागत देख अन्यान्य देवता भा धीरे घौरे इनक अठुगामी हुए। इस अयसरम पत्र समस्त स्पर्ग राउय पर अधिकार कर समस्त देवउधान, गजराज पेरा घत, दथपयर उच्च श्ररर, कामथेत्नु पारिजात, यावनोष विमान भौर भप्धरापे आदि ख्र्गरज्ञाक्षा उपभोग करन लगा | रि वक्षम्ा मां पुत्र सुख्बस खुली हा बहा दी अयस्थान क्रम छगे। इधर सुरगण अपने अपने स्थानेसे स्रष्ट दे गरिरिदुग दर अपस्थान करने रंगे । यह्रमागसे धश्चित रदनेक वार्ण उनको अत्य तक धोने लगा। पोछे मुनियेसे थे मिल कर इस्द्रके साथ फैशाशशिखर पर मदादेवक पास गये और द्वाथ भोड कर अति पिनात मायसे उनफ चरणाम गिर कर कदने लगें-- मगवन ! आप मयार क्थणा निधि दैं। आप दम लेगाके बचाश्ये। दम लेग ब,लासुर द्वारा पराजित भौर स्थान प्रष्ट हुए हैं भौर अत्यत हशके साथ दिन दिता रहें हैं। ६ दयासय | झाप दया प्रकाश कर उस यरमदसे मरा दुय, क्त बता छुरकका ध्यस क्ीजिपे और दम लोगाका दुखसे वचांइये। दघताओ के इस तरह दुःखपूर्ण विनोत बाफ्वाय सान पर शह्ढूने कद्वा--हैं खुरगण । ग्रह्मा्ता सागे कर इरिफ




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