न्यायदर्शन | Nyayadarshanam

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Nyayadarshanam by गौतम मुनि - Gautam Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ए भ्यायदृशेश-प्ापालुषादअस्यक्षानुमानोपमानशब्दा प्रमाणानि ॥ ३॥ प्रत्यक्ष, भमु माल, उपसान झौर शबइर ये (चार) प्रमाण हैं। इत के लहर ग्रभ्यफार ले आागे ही किये हैं कि-/ इन्द्रियार्थसल्लिकर्षोत्पत्म॑ कज्ञानमण्यपदेश्यम-ठयमिचारि व्यवसायात्मक प्रस्यक्षम्‌ ॥ २ ॥ इन्त्रिप और झथे छे संयोग से जो काल होता है रुते प्रत्यक्त कइते! खिस का शास श रख सके जो क्षटल सथाये और सिश्षपरुप हो ॥ «.. अथ तत्पूर्वक तजिविधमनुमान पूर्वेब- रुछेपबत्‌ सामान्यतोदृष्टज्ू ॥ ४ ॥ ( साध्य शाथल के संबन्ध देखने से जो ज्ञात होता है रुसे भ्रशमात कई | हैं, भगुसान से जो सिंद् होता है उसे भाभ्य औौर शिस के द्वारा साध्य जा लय उठे साधन कइते हैं| इम्ही को लिड्री मौर लिड्रू भी कइले हैं। झऊते ५ को लट( २ देखा वद्दांर भग्नि को क्षो देखमे से ज्ञात हुआ कि घूस विना र्भाः जह्टीं रहता।इसी जात को व्यप्ति त्ञात कइते हैं,ष्पापक्ू-मपिकरण में व्या' का नियम से रदला य्याप्ति है। भषिछ देश में को रहे वह व्यापक, जीसे जा चूम रहता है वहा भग्नि अधएप रह्टता है भीर तह घूम सही रहतावहा ! शइता है फंसे तपाये हुए छोइद के गोले में भरित रइता है पर घूत लीं इस हि फश्ति ध्यापक भौर जुस व्याप्प है क्योंकि कगित के अभ्मांव में सहाों रहता अर देश में रहसे से त्याप्प कहाता दे किर कटी क्रेयश भूल के देखने अग्ति का क्लाल होता दे इसो को भशुगान कहते हैं । यहां सप्ति सा भौर घ्रूमत को साथत ससम्दता चाहिये) भज मस्यक्षपृषक अमुभाम सी प्रछार रा हि १ पृथवत २शे पथत, भी र ३ भानाम्पतोहु्टां जहां फारण से काय ' अलुनान दोता है उसे “ पृषदत्‌ * कहते हैं| जैसे घाइलों के उठने से हो घाली बवो का सनुसास । क्योंकि मादलों का ट्रोना तपा का कारण का शर्पा काम है। इस से दलते अघात कार्य से कारण के झगुनाव को “ शे' बल कहते हैं. शैसेसदी कि चदाय से प्रथम हुई दृए का अलनगास । लदी अदता बों का फाय है। भन्पत्र वार २ देसमे से क्ाप्रस्यस्त दृभरे के भ' सास दो सासाम्यताटूष्ट' कहते हैं। जैसे फोई पदाथ विना फिसा के एक रुप। से दूबरे श्पान पर जा सहीं शकरा । यह कई बार दुसने मे सिद्व हा गया नी उ सस््तयघयप-यघयघयघयघयतयघतघतघवय+++७+ततव लत न ती तीन न नल.




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