बिचित्र रामायण | Odiya Vichitra Ramayan

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Odiya Vichitra Ramayan by पंडित नन्द कुमार अवस्थि - Pandit Nand kumar Awasthi

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about पंडित नन्द कुमार अवस्थि - Pandit Nand kumar Awasthi

Add Infomation AboutPandit Nand kumar Awasthi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
. ६(28)- स्थान में ँ मा | में थोड़ा- में वर्गीकरण। फिर प्रत्वेक बर्े के अक्षरों का हर ऐसे अनेक गा दर थोड़ा ऊपर उठते हुए अनुर्नांसिक तक कम अर जो अभारतीय लिपियों में एकत्र, एकसाथ नहीं मिलते। किन्तु ये गुण ३ रूप से सभी भारतीयं लिपियों मे मौजूद है, अत: वे सब नागरी के समान ॥ विश्व की अन्य लिपियों की अपेक्षा 'सर्वाधिक वज्ञानिक' हैं। सब ब्राह लिपि से उद्भूत हैं। ताड़पत्न और भोजपत्र की लिखाई तथा देश-काल-पात्न के अन्य प्रभावों के कारण विभिन्न भारतीय लिपियों के कक्षरों के रूप में यत्त-तत्त परिवतंन, हिन्दी वाली 'नागरी लिपि” को कोई श्रेष्ठता प्रदान नहीं दा । भारत की मोलिक सब लिपियाँ 'नागरी लिपि” के समान ही श्रेष्ठ हैं । तागरी लिपि को “भी' अपनाना श्रेयस्कर क्यों ? “त्ागरी लिपि” की केवल एक विशेषता है कि वह कमोबेश सारे देश में प्रविष्ट है, जबकि अन्य भारतीय लिपियाँ निजी क्षेत्नों तक सीमित हैं । वही यह भी सत्य है कि नागरी लिपि मे प्रस्तुत हिन्दी (खड़ी बोली) का साहित्य, अन्य लिपियों में प्रस्तुत ज्ञानराशि की अपेक्षा कम और नवीनतर है। अतः समस्त भाषाओं की ज्ञानराशि को, सर्वाधिक फंली लिपि “नागरी” मे अधिक से अधिक लिप्यन्तरित करके, क्षेत्रीय स्तर से उठाकर सबको सारे राष्ट्र में, यहां तक कि विश्व में ले आना परम धमं है। विश्व की सब भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान (सत्साहित्य) तो है आत्मा, और 'नागरी लिपिः होना चाहिए उसका पर्यटक शरीर । भत्य लिपियों को बनाये रखना भी कतंव्य है। वस्तुत: यह परम धर्म है कि समस्त सदाचार साहित्य को नागरी में तत्परता से भ्राचुयं में लिप्यन्तरित करना। किन्तु साथ ही यह भी परम धममं है कि देशी-विदेशी अन्य सभी लिपियो को उत्तरोत्तर उन्नति के साथ बरक़रार रखना। यह इसलिए कि सबका सब कभी लिप्यन्तरित नहीं हो सकता 1 अत्तः अन्य लिपियों के नष्ट होने ओर नागरी लिपि मात्र के ही रह जाने से विश्व की समस्त अ-लिप्यन्तरित ज्ञानराशि उसी भ्रकार लप्त-सुप्त होकर रह जायगी जंसे पाली, प्राकृत और अपभ्रृश, सुरयानी आदि का वाहममय रह गया। जगत्‌ तो दूर, राष्ट्र का ही प्राचीन आप्तज्ञान विलुप्त हो जायगा । मागरी लिपि वालों पर उत्तरदायित्व विशेष ! इन दोनों परम धर्मों की पूर्ति का सर्वाधिक भार नागरी लिपि वालों पर है, इसलिए कि उनको 'सम्पर्क लिपि! का श्रेष्ठ आसन प्रदत्त है। मैं कह सकता हूं कि उन्होंने अपने कतंव्य का, जैसा चाहिए था, बैसा निर्वाह नही क़िया। परन्तु 0 विलिया में अन्य लिपि बालों को भी “अपराध राध वहीं करता चाहिए। 'कोयला' ब्वि हा का बंगाल का है, इसलिए हम उसको नहीं लेगे, तो बह दम गए बातक होगा। कोयले की क्षति नहीं होगी । अपनी लिपियों को पमुच्तत रखिए, किन्तु नागरी लिपि को 'भी” अवश्य अपचाइए ।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now