याज्ञवल्क्यस्मृति | Yagyavalkya Smriti

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
13 MB
कुल पष्ठ :
752
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)प्रस्तावना
थ्री नारायण मिथ
संस्कृत तया पालि विभाग *
भारती मद्दाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
श्रुति स्थती चहुपी हे दिजानां न्याय दर्म॑नि 1
मार्गे झुद्यन्ति वद्धीनाः अ्पत्तन्ति पथर्च्युताः ॥
( बृददस्एति-स्म्टति, संस्कार-काण्ड, श्छो० ११ )
इस अमर आत्मा को जन्म-जन्मान्तर तक अत्यन्त क्योर तपस्या करने के
बाद मानव-छरोर में प्रवेश और उस शरीर के माध्यम से अपने को इस प्रपशल
से विमुक्त करमे का अवसर प्राप्त द्ोता है। परन्तु खेद का विषय दैकि
मानव शरीर में गर्भाशय से निसरण के साथ साथ ही इस (भाप्मा)की
कर्तव्य बुद्धि विश्एति के गते में विछीन दवा जाती है । जिस उद्देश्य से यह धात्मा
मानव-शरीर के अधियम के लिए कठोर प्रयास करती र्दती है उस उद्देश्य की
पूर्ति भाकाश पुष्पायित सी हो जाती है। इसी कारण से जन्म छेते ही जीवाध्मा
को पुन रोना ही पढ़ता है। अपने कत्तंब्य के विस्मरण के कारण जीवास्मा के
बिछाप का निम्न-लिखित पथ में वहुत दी मार्मिक रूप में अ्रतिपादन किया गया है--
जातो सतश्र कतिधा न फति स्तनानां
परीतम्पयो न कछिठा कृति मातरो न 1
उरपत्य बन्धविधृतावधुना यतिष्ये
इस्यस्य विष्लवमुपति घद्दिमेनीपा 0
कर्म चक्र में इस प्रकार अनादि काल से परिभ्रमण शील जीवास्मा की उपयुक्त
परिदेवना से आद हृदय बाले परमर्पियों ने अपने क्षान दीप में भ्रतिभासमान
परम्परागत असण्ड ज्ञान राशि स्वरूप बेद को जीवास्मा के कत्तेभय के परिशान के
लिए अभिग्यक्त किया। परन्तु वेद भी छुछ ही विवेकी पुरुषों के लिए उपयोगी
सिद्ध हुआ न कि स्व साघारण के छिए॥ भरत करुणा प्रवण मधु आदि मद्दर्षियों
ने अपने घेदिक विज्ञान को सर्ब-साधारणोपयोगी बनाने के छिप घमंशारप्र का
निर्माण किया। इस धर्मशास्त्र में धर्म शासक ऋषि के द्वारा भायेण वेद्क ज्ञान
की दी २सति होने के कारण इसे € घर्म झास्त्र को ) स्टति शब्द से भी अ्मिद्वित
क्या जाता दे ( धम शास्त्रन्तु ये स्थति--मचु० २१० ) 1
यधपि सछृति-प्रन्यों में छुछ ऐसे भी तत्य हैं जो वत्तमान बेद में उपठब्ध
नहीं होते तथाईप उन तत्तों के घेंदिक श्ञाव पर दी निर्मर होने बा अलुमात
किया जाता है। * यद्यवि घ॒र्म के प्रतिष्टित स्याख्याता जैमिनि ने यह भी माना दे
३, वष्व्य--'शुवि स्मृति विरोषे तु झुनिरेव गरीयसी १” --जाबाल स्वृठि
#्युत्या रद विरोधे सु बाध्यते विषय दिला ।?_-- सविध्य पुराण
+-मूतु २१३ की ध्दाख्दा में कुल्दकमट्ट दारा दशुइवा
रे या० भूए
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