अथर्व वेद का सुबोध भाष्य भाग 4 | Atharva ved ka Subodh Bhashya Bhag 4

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Atharva ved ka Subodh Bhashya Bhag 4  by श्रीपाद दामोदर सातवळेकर - Shripad Damodar Satwalekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कांण्डोंका परिचय ] प्रतरं घेह्मेनाम्‌-- इन ख्रीको विशेष उच्चत कर । स्िया समानानाते सर्वान्त्स्थाम-- संपत्तिसे दम सब समानेंसे विशेष हों । अधस्पद्‌ द्विपतस्पाद्यामि-- द्वेप करनेवार्जोंको नीचे मिशाहे हैं । मा त्वा प्रापत्‌ छपथों मामिचारः ( १॥॥1३२ )-- तुझे शाप प्राप्त नद्दो भौर बध भी तेरे पास न भावे। अभ्यावर्तस्त पद्ममिः सदैनाम्‌ ( ११1१४२२ )-- इस परनीको पशुमोंके साथ ब्राप्त द्वो । क्षेत्र अनमीया थि राज़-- भपने क्षेत्रमें नोरोग होकर विराजों असंद्री शुद्याभ्प धेद्दि नारि, तन्चोदत सादय दैवा- नाम्‌ ( ११।१।२३ )-- शुद्ध न हूटी थाऊीको, दे ख्री | चूडेपर रख, उसमें देषोंकि किये लन्न पकाणो। ते मा रिपन्‌ प्राशितारः (१११२५ )-- झस क्ष्षको पीनेवाछे नष्ट न हों । ( भ्रन्नम्मे दोप न दो । ) दयाशील री अर पचामि, अद्दं ददृशमि, ममेंदु कमंन्‌ करुणेड्थि जाया, फौमारों छोफो अजनिष्ट पुश्नोडस्चार- सेथां घय उतस्तरावत्‌ ( १९३४७ )--मैं पकाता हूं, में देता हैं, मेरी परनी दयाके कर्मेमें यरन करती है, हमें कुमार पुत्र रतन हुणा दे। उच्च नवष्या प्राप्त कावा हुआ उच्च जीवन ब्यतीत करे ] हु सब ल्‍ दान द्दामीस्येष दुयाच्‌ ( १शश॥+ )-- देवा हूं देता दी कद्दना चाहिये 1 पापसे बचाव के नो मुश्चस्वंद्सः ( १३४१-१३ ;-- पे हमें पापसे थच्चादें | मे यपपुरा चकृमा फद्ध नूनसृतं घदन्तो अच्त सपेम ( 12$10 )-- जो पदिेके डिया सही यद अब ईसा वर, सत्य बोछनेवाले लपत्य कार्य केसे करें? मे तिषटन्ति न मि मिपस्तयेते देयानां स्पद्ा इद ये ब्यराम्ति ( १८१६ )-- देपोंडे पास यहाँ जो चछते है, दे मे रदरते हें म जद बंद कहते है ( वे पापी पदइते दी हैं । ) (५) ” प्रापभाहयः खलार॑ निमच्छात्‌ ( १८१॥१४ )-- बहि- नके पाप जाना पाद कद्दछाता है । पृत्रकामना बह्मौदर्न पचति पतञ्रकामा (४११३॥१)-- पुत्रकी इच्छा करनेवाली माता ज्ञान बढानेवालू। भन्न पकाती है। अद्वोघाविता चाचमच्छ ( 4111२ )-- ब्रोह न करने- चाह्टोंकी रक्षा करनेकी मापा बोक | पृतनापाद्‌ छुबीरों येत्र देवा अश्नदवन्‍्त » शंत्रून्‌ (११३ )-- सेनाका पर।मव करनेबाह्ा उत्तम वीर है, इससे देव शय्रुझनोंका परामव करते दें । अजनिष्ठा मद्ते वीर्याय ( १११३ )-- बडे पराक्रम करनेझे लिये जन्म छो । अस्मैं रथिं सर्वचीरं नि यच्छ -- सब इत्रपौग्रोरे साथ रहनेवाऊा घन इसको दो । विद्वान देवान्‌ यज्चियां पद बक्षः ( १४१४ )-- व्‌ विद्वाव्‌ पूजनीप देवोंछ्ों यद्वां छे भा। च्युन्ज द्विपतः सपत्नाय ( १६11६ )- दे करनेवाले सपरनोंकोी दूर कर | सजातांसस्‍्ते बलिहतः कूणोतु ( १११६ )-- खजाति- योहो कर देनेवाऊे करे 1 उदुब्जैनां मदते चीर्याय ( १119० )-- मदान्‌ पर क्रम करनेके लिये ऊंची प्रेरणा कर । गच्छेम सुझृतस्य छोक (11111८ )-- पुण्यकमे करने- वाछेके छोकको हम जाप । * ऊध्चे प्रजामुद्धरन्व्युदृदद ( १११४६ )-- प्रमाद्या ददार करनेके; छिये ऊपर ढठावों ॥ * पिया समानानति सर्पान्‌ स्पाम (१११११२ )-- घनसे हम सब सम्तानोसे झागे यढेंगे ) अधस्पदे द्विपतस्पादयामि-- शयुझो मोौचे मित देहे हैं । पद्ठा पालन मा नो इहिंसिए द्विपदो भा चमुप्पदा ( 4918१ )>- हमारे द्विपाद, चत॒ुष्दादोंदी हिंसा न छरो | प्राण ब्राधाय नमो यसप सयोमिर पदों (११४३ )-- जिपरे अपोग सब दें इस प्राघरे डिये ममरदार करता हूं।




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