हिंदी साहित्य की प्रगति | Hindi Sahitya Ki Pragati

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिन्दी नाटक सन १६६१. . हे ग्रालोच्य काल. में पूर्व की भाँति राजनीतिक सामाजिक पौराशिक धार्मिक एवं गीति नादयों का प्रणयन तथा प्रदर्शन हुमा है । प्रत्येक प्रकार के नाटकों का स्लग- अलग विवेचन करने के उपरान्त हम नाट्य साहित्य की सामूहिक प्रगति का निष्कष निकालने का प्रयास करेंगे । राजनीतिक सादक-- सन्‌ ६० तक राजनीति सम्बन्धी समस्याश्ों प्र श्राधृत नाटवों का सूल विषय पंचज्लील का गुणगान भूदान झ्रान्दोलन की महत्ता पंचवर्षीय योजनाओं से उत्पन्त होने वाले सुपरिणामों का श्राइवासन ही अधिकतया पाया जाता था । इस वर्ष के नाटकों में एक भिन्न प्रकार का स्वर सुनाई पड़ रहा है । पंचशील की पुकार से उत्पन्न भारत श्रौर चीन की मंत्री का कच्चा घड़ा स्वाथे की. फौहार पड़ते ही फूट गया । चीन ने सीमा का शझ्रतिक्रमण कर भारत पर श्राक्रमण करके पंचशील के सिद्धान्तों को रौंद डाला है । भारत के कोने-कोने से चीनी ग्राक्मण का विरोध हुआ 1 यह विरोध की ध्वनि इतनी प्रबल हुकार के साथ गज उठी कि पंचशील के दुगे में एकान्त चिन्तन करने वाले नाट्यकार भी विश्वब्ध हो उठे । पंचमांगी नामक नाटक में यह स्वर सबसे ग्रधिक प्रखर रूप में सुनाई पड़ रहा है । नाटक का नायक चांगफ प्रचशील के सिद्धान्तों के स्थान पर क्रान्ति श्ौर साम्यवाद के श्रान्दोलन का प्रचार करते हुए कहता है--जिसको तुम धोखेबाजी श्र फरेब कहते हो हमारे आ्रासंनल का झ्रसली हथियार वही है । सारी दुनियाँ में इसका उपयोग करके हमने सफलता आप्त की है । लक्ष्य पूरा होना ही चाहिए वह चाहे जिस तरह भी हो । साम्यवादी चीन के एजेण्ट भोली-भाली सीमावर्ती जनता को दोषण और दरिद्रता से मुक्ति दिलाने का प्रलोभन देकर उन्हें साम्यवादियों के पक्ष में लाने का प्रयत्न करते हैं । इस प्रयत्न में उनका तक यह है कि राष्ट्रवाद का युग समाप्त हो गया हैं अब साम्यवाद का युग आ्ाया है । चांगफू श्रहोम से कहता है दुनियाँ के कोने-कोने में पीड़ित और शोषित जनता इनक्लाब कर रही है । शोषण से मुक्ति का सम्बन्ध न तो देश से है न परदेश से । इसका सम्बन्ध है जनता के जीवन से उसकी रोजी श्रौर रोटी से । झ्ागे वह फिर कहता है-- न जाने तुम लोग क्यों राष्ट्रवाद की मुगमरीलिंका से मुक्ति नहीं था सके हो । साम्यवादी एजेण्ट अ्रहोम ने भारत प्रोर चीन के कलह का दोष तीन प्रकार के व्यक्तियों को इस प्रकार दिया है वह कहता है-- (१) उन जन्म खोरों को पहचानों जो तिल को ताड़ बना कर दो देदों को लड़ा देना जानते हैं । (२) उन पु जीपतियों को पहचानों जो युद्ध से उत्पन्न मुनाफाखोरी की राह देखते-देखते व्याकुल हो उठे हैं । (३) पहचानों उन सास्राज्य- -वादियों को जो बिल्लियों की लड़ाई में पंच का रोल श्रदा करने वाले बन्दर की तरह स्वयं प च बन कर दो मुल्कों को पुन हड़प लेना चाहते हैं ।




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