आह्रिकसार संक्षेप | Ahriksar Sankshep

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Ahmiksar Sankshep by प्रकाशकर - Prakashkar

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about प्रकाशकर - Prakashkar

Add Infomation AboutPrakashkar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
जज रलनुं पोताना हृदय विश्वे स्थापन करी देशबन्धुओना हृंदयमां पण उप॑देशामृतद्वारा तेनुं स्थापन करी रह्मा छे; जेथी सदसह्िविक शकती सचेतन तथा सबल थवा लागी. आजकाल विवेचक शक्तीना जागृतीडुं काम पण घणे भागे लोकादरने पात्र थर्यु जने सिद्ध थयु छे केः--- धर्म एवं हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षितः। जा प्रमाण दैवगति अनुकूल थतांज “ दोढसो बरसथी पाश्चिमात्य संस्कृतिरूप राजयक्ष्मनो रोग छागेछो छतां पण, ० कालछोहये निरप्रथ्रिविंपुला च पृथ्वी | ”” कार निरवधि छे; अने पृथ्वी विपुरु छे. त्तो कोईंपण मारो पक्षपात्ती उतन्न थशे. ” घवा आश्ञावादना आधीन बनी केव प्राण घारण करी रहेली; अनेक नाथ छतां अनाथ; तथा अनेऊ पुत्रों छतां निषुत्ञिफ एवी प्राचीन आर्य्॑स्कृति छोक्रमान्य-महात्मा- ओना जादेशायृतने छीथे हकवे हक्वे पुनरुज्जीवन मेह्थबवा पात्र थई. तो आवी वखते “ प्राचीन संस्कृतीने सारी शक्ती आपनार पण बोजारूप थई न पडे, एवो आचार विचार प्रति- पादन करी व्यवहार तथा धर्मशाख्र आ बेड विषयनो सुकाबछों करनार “ छघु पुस्तक ” कोमल अंतःकरणना नवयुवकोना हायमां अचश्य आपवुं जोइए; फे जेयी तेमना आअंतःफरणमां $ नवमीयन ” नो संचार थई, छेवटे श्रीमन्‍्मद्रामारतमां कश्या मुजब- ने जातु कामान्न भयान्न छोभादमे त्यजेजीवित-




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now