पार्वती मंगल | Parvati Mangal

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Parvati Mangal  by गोस्वामी तुलसीदास - Goswami Tulsidas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पा्॑ती-संगल - १९ दुलहिन पावती जी हैं, शिव जी वर हैं, इस सम्बन्ध के साधक ( पक्का करने वाले ) ये सप्तर्षि हैं। अत! यह काम अवश्य ही सिद्ध होगा । ऐसी आकाश्-बाणी हुई ॥ ८९॥ भयठ श्रकनि भानंद महेल मुनीसन्ह। देहि सुलोचनि सगन कलस लिये सीसन्ह ॥ ६० ॥ आकाशवाणी छुन कर शिव जी तथा सप्तर्पियों को आनन्द प्राप्त हुआ | सिर पर जल से भरे कहसे लिये हुए सुन्दर नेत्र वाली स्लियाँ समुन जनाती हैं || ९० ॥ सिव सो कहे दिन ठाउँ बहोरि मिलनु जहेँ । चले मुद्ति सुनिराज गये गिरिबर पहुँ॥ ६९ ॥ शिव जी से फिर मिलने के लिये दिन और स्थान वता कर जसन्न होते हुए प्रुनि- वर हिपवान के पास गये ॥ ९१ ॥ ,गिरिगेह गे श्रति नेह भादर पूजि पहुनाई करि। धर बात घरनिं समेत कन्या भ्रानि सब आगे धरि ॥ सु्र पाह बात चलाइ सुदिनु सोधाइ गिरिहि सिखाइ के । ऋषि लाथ प्रातहि चले प्रमुदित ललित लगन धराह के ॥ ६२ ॥ सप्तर्पि हिमबान के घर गये । उन्होंने उन लोगों का अति आदर और रसनेह से पूजन कर पहुनई की । श्र की सामग्री, ख्ली तथा कन्या समेत सब कुछ सप्तर्षियों के आगे धर दिया | हिमवान के आदर सत्कार से सुखी हो कर ऋषियों ने विवाह की थात चलायी ( विवाह सम्बन्ध तय हो जाने पर ) शुभ मुहूर्त निश्चित करके सुन्दर लगन धरा कर सप्तर्पि प्रसन्न होते हुए प्रातःकाछ वहाँ से चल दिये ॥ ९२ ॥ विप्रइंद सन्‍्मानि पूजि कुलंगुरु सुर । परेड निसानहिं घाड़, चाउ चहुँ दिसिपुर ॥ ६३ ॥ प्राह्मण मण्डडियों, कुलगुरु तथा देवताओं के सम्मान सहित हिमवान ने पूजा की । ( विवाह सम्बन्ध की सूचना के लिए ) हैँके पर चोव पढ़ा नगर में चारों ओर उछाह छा गया ॥ ९३ ॥




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