वैयासिक न्याय माला | Vaiyasik Nyay Mala
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
305
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)डरे
पभ्रादिका निरूपण है । चतुर्धाष्याय-फलाष्यापमें सगुण भौर निर्गुणविद्यारे फलविशेषक्रा
साज्भोपाज़ निष्पण तथा जीउम्मुक्ति, विदेहमुक्ति, णीवकी उत्माम्ति,पिज्याण, देवपान-
मार्ग भौर प्तगुण ब्रह्मकी उपासताके फलोमे तारतम्पविषयक विचार है 1
ब्रह्ममूतके भ्रष्ययनमे यह स्पष्ट है कि बादरायणश मुनिसे भी परुवंकालमे प्रतेक
भ्राचायंत्रि वेदान्ततस्वकी मीमामसा की है। परन्तु उन भाचायोंकी वे वृत्तियाँ भव उपलब्ध
नहीं हैं। घैसे-- (१) भाजेय, इनका नाम एक वार (ब्रह्ममूत्र ३४1४४) में निदिष्ट है।
(३) प्राश्मरप्य--इनका निर्देश दो बार (ब्रह्ममृत्र (1२1१६, १।४)२०) में मिलता है ।
इनके मतमभे जीवात्मा तथा परमात्मामे भेदाभेद सम्बन्ध है। ये भेदाभेदवादी थे ।
( ३ ) भोइुलोमि--इनका निर्देश तीन वार ( ब्रह्ममृत्र ४२, ३॥४।४५, ४४६ )
में है। इनके मतमे भवस्था भेदसे भेदाभेद है--संस्तारदशामे णीव भोर ब्रह्मका भेद
भौर मोक्षदशामे भ्भेद है। ( ४ ) कार्प्यानिनि--इनका नाम निर्देश (अह्मसुत्र ३४१६)
में एक वार प्राया है। ब्रह्ममृप्मे 'रमणशीयचरणाः” ( छा० ५११०॥७ ) के ऊपर इनका
विशिष्ट मठ है । ( ५ ) काशइस््त--( ब्रद्मसृत्र (४1२२ ) इसमे परमेश्वर ही संध्तारमे
जीवहूपसे प्रवश्थित है। जीव परमात्माका विकार नही है। भाचार्य शब्भूरके शब्दों
इनका मत श्र त्युनुमारी है, प्रतएव वह मान्य है। ( ६ ) जैमिनि--इनका नाम ब्रह्म-
मृक्ष्मे ११ वार भाया है । मे बादरायण मुत्िके साक्षाद् शिष्य माने जाते हैं। ये मौमाश
दर्शनके रचयिता हैं। (७) बादरि-पराशर--इनका उल्लेख (ब्रह्म-सूश्र २1३०, ३॥१।१ १,
४॥३॥७, ४४।१० ) में चार वार भाया है।
भरद्व॑ तवेदान्तका मूलसिद्धान्त है प्रत्यगमिन्न श्रह्मकी पारमाथिक सत्ता भौर प्रनेकात्मक
जगतुकी मायिञता । झात्मा भनुभूतिस्वरूप होनेसे स्वयंसिद्ध है। इस विषयमे “सत्य
ज्ञानमनन्त॑ ब्रह्म” इत्यादि श्रुति प्रमाण है।
जीवब्रद्मकी एकता--लोकप्रसिद जीव ब्रह्मका भेद प्रार्माधिक नहीं प्रत्युत
ओऔपाधिक है ॥ जीवब्रह्मेय्प वेदान्तमिद्धान्त 'प्रहूं ब्रह्मास्मि! 'स भात्मा तत्त्वमस्ि” “यदग्ले
स्पापहं त्वं त्वं वा घा स्पामहम्! ( ऋऋ७ द८ा४ड४ड1२३ ) भादि श्र् तिवाक््योमें प्रतिं-
पादित हैं। “मनेन जोवेनात्मवाइनुप्रविश्य नामरूपे द्याकरवाशि/ (छा० ६1४1१) (जीव-
झूपसे इनमे प्रनुप्रवेशकर में साम-रूपको भमिव्यक्ति करूँ ) 'तत्सप्ठटा वदेवानुप्राविशत्
इत्यादि श्रुतिवाक्योमे ब्रह्मगा ही जीवरूपसे ब्यपदेश है। एकमेवाद्वितीयम्” 'नान््योडवो-
उस्ति दष्टा! 'एको रुद्रों न द्वितोयो5वठस्थे! 'पुरुष एवेद सर्वेम ? ( पु० सू० २ ) 'पात्म॑वेदं
सर्वम्! “ब्रह्मेवेद सर्वम्? 'नेह सावा5हिठ किशन! इत्यादि श्रुतिवाक्य भेदका अ्रपवाद
करते हैं | भ्रतः उपाधि रहित जोव ब्रह्म ही है । इमो श्रूति सम्मत सिद्धान्तका ही भगवान्
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