वैदिक - देवशास्त्र | Vaidik - Devashastra

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Vaidik - Devashastra by डॉ. सूर्यकान्त - Dr. Suryakant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका 211 प्रापाश पौर पृथिदी के विवाह से पहले की ग्रवस्था थी । कितु इसमे विविधता के बीज सनिहित थे (३) स्ग-रचना झ्राकाश झोर घरती के पृथक्‌ होने के साथ प्रारम्भ हुई; भर भ्रादिम बीज ने एक नड था रूप घारण विया जिसमे पे देवता उत्पन्त हुए । (४) विवाह की कल्पना उनके पार्थव्य के बाद उत्पन्न हुई, जब कि दो भिन्नलिंगी देवता झपस में मिले ; उनके संस से देवता पंदा हुए भर जगत्‌ की रचना हुई (५) भौर भन्त में इमनमी माता भग्निदेव को जन्म देते समय स्वयं मर जाती है भौर उवरकता के देव उसके मरे शरीर से जस्म लेते हैं। इस कथा या झन्तिम तत्त्व हमारे तिये महत्त्व का है, क्योंकि इसके अनुसार चीरुधो की उत्पत्ति इक़नमी के वात्तविक शरीर से होती है, न कि उसके इफ्नगी के साथ होमे वाले संसर्ग से । यह सर्गं-रचना इभनमी के शारीरिक बलिदान से होती है श्रौर इस वलिदान मे ही जीवन-प्रक्रिया का सार सनिहित है। इस कथा पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि सर्ग-रचना दो प्रकार से होती है; एक लैंगिक संस्र्गं से भौर दूसरी शारीरिक बलिदान से ; विज्ञेपतत उस बलिदान से जो कि अपनी इच्छा से दिया जाता है ! हमारी बैदिक गाया में सर्ग-रचना की दोनो ही विधाए दिखाई गई हैं । धब से पहले प्रादि पुरष, जो कि सहल्लाक्ष एव सहस्नपाव्‌ था, अपने आपको बलि चढाता हैं और उससे जगत की उत्पत्ति होती है । बाद मे लैग्रिक भ्रक्रिया चल पडती है भौर सर्ग की प्रगति प्रवाध बन जाती है। सशक्त बणंन से सार निकलता है कि “रचना एक प्राणी को बलि चढाए बिना नही हो सकती ; फिर चाहे यह प्राणी एक देत्य हो, सगिक पुमाद हो, माता देवी हो और या एक युवती स्त्री हो ।” सर्ग-विषयक यह वात उसके हर स्तर पर लागू होती है : यह लागू होती हैं सगं-रचना पर, मानव-निर्माण पर, मानव-समाज की जाति-विज्येष के निर्माण पर, वनस्पत्ति-वर्ग के भेद-विशेष पर और प्राणिजात अथवा प्राशि-विशेषों के निर्माण पर । रचना का रहस्य उसी एक तत्त्व, अर्थात्‌ जीवित के बलिदान मे सनिहित है। इसीलिए सर्गं-रचना कही-स्मिर, कही पान-कु झौर कही पुरुष की बलि से बताई गई है । वलि के लिये वो गई हिंसा हिसा न होकर उलटी उत्पादक बन जाती है । या यो कहिये कि वध के समय बध्य के भ्रभ्यन्तर सगे-शक्ति इतनी भ्रधिक प्रोद्भूत हो छुकती है कि वह उसके घाव हारा उसमे से फटकर इधर-उधर सक्रिय हो उठती है और उससे रचना सतति प्रवृत्त हो जाती है । बलिदान से सर्ग-रचना होने की भावना विश्वजनीन है, विशेषत, समाज के उन वर्गों में, जिनका कृषि वे साथ सीधा सम्बन्ध है | भारत के भ्रादिवासी खोण्ड लोगो में मेरिया झौर अभटेवस लोगो मे युवती की बलि उदाहरण के लिये पर्यात है 1 भेरिया अपनी इच्छा से वध्य बनता है । उसे विवाह करने झौर सतान उत्पन्न करने को श्रनुमति होती है और वह जीवन की अ्रशेष सुविधाएं भोग सकता है। कितु उसे भारम्भ से ही उस देवता का स्वरूप मान लिया जाता है जिसको कि वलि चढाई जानी होती है। लोग मेरिया की पूजा करते हैं, उसके चारो ओर नृत्य करते है भौर रगरलिया मनाते हैं 1 बाद मे वे भ्रूदेवी से प्रार्थना करते है---“मो देवी ! हम छुम्हे यह वलि चढाते हैं।” और तब




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