शतपथ भाग ५ खंड १ | Sathpath Bhag-5 Khand-1

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Sathpath Bhag-5 Khand-1 by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रद झतपथ होने बारी है, अतण्प आहपनीय अग्नि को भश्मर॒द्तित वर अज्वलित करो, यद्दी सालय्य है। अग्नि को प्रज्वलित करना ही अम्निसम्माजन कम्म है। अध्यर्यु- शत पूर्वाघार के अनन्तर बयोंकि यही रर्म्म तोता है; अत अध्वयूं इसी पे लिए पूपां- घारमाघार्य्य प्ंप कर्ता हे । पूवाघारकर्म्म वी इसी इततिपत्तायता का स्पष्टीकरण करते हुए सूपफार कहते हैं-- “अनुयचनान्ते वेदेनाहवनीय जिरुपयाज्य, खूवेण पूर्या घारमाधाये- आह/अग्निमग्नीत समृट्टी” ति (शान और सू> ३११२ )। बतलाया गया है कि, पूर्वाघार फर्म्मानन्तर स्फ्य, तथा इध्मसन्नदनदृण, दोनों फो आग्नीध् के हाथ मे सोंपता हुआ अध्वर्यूं उस को अग्नि-सम्माज्जन कर्म्म के लिए प्ररित करता है। अध्वर्युद्वारा भेरित आग्नीभ अध्वयुंद्वारा भदृत्त इध्मसनहन हुणसमूह से पूतर की ओर से घूमकर-'अरने वाजजिद्वाज तथा सरिप्यन्त घाज- जि सम्मार्ज्म! यद सन्त चोलवा हुआ वक्षिणपरिधि का सम्मा्ज्शन करता है एक बार उक्त मन्त्र से, तथा दो बार तृप्णी, इस प्रकार दक्षिण परिधि का क्षीन पार सम्माज्जन करता है । अनन्वर उसी मन्त्र से एक बार पश्चिम परिधि का, दो बार तृष्णी, इस भ्रकार त्तीन यार सम्मार्जन करता है। जनस्तर उसी भन्‍्प से एक बार उत्तर परिधि का, तथा दो बार तूप्णा, इस प्रयार पीन यार सम्मार्जन करता हे। इस प्रकार पश्चिम, दक्षिण, उत्तरस्थ तीन परिधियों का एक एक बार मन्द से; दो+ दो बार तृष्णी, सम्भ्य ६ थार्‌ सम्मार्जन फरता है) इसी इध्मसम्माज्जन फर्म्म की इतिकत्तंव्यवा चतलाते हुए सूथकार कहते हँ-- ध्या “बधयसन्नहमेरठुपरिधि सम्माप्टि--“अग्नेवाजबि” दिति प्िखि* परिक्रामम” ( कान थीन सू० ४११३ )5 समन्त्रक परिधिसम्भाज्जनानन्तर उत्तरस्थान में खडा हो वर यह भर्नीप्र बिना मन्च अयोग के आहयनीय अग्नि का तीन वार सस्भा्जन करता है।जेसा फि “तृष्णीसुपरि” ( का० श्रौ७ सू० ३११४ ) सूत से प्रमाणित है) तर इस प्रकार जब आसनीध जिखियार रामन्धक परिधिद्रयसस्यार्जनकर्मे, तथा खास चुण्णी आहवन्तीयाग्निसम्मार्जनवर्म्म कर हेता हे, तो अनन्वर बह अध्यर्यु- आई नमो देवेस्थ , आओ स्पधा पिछुम्य// यद्धू घोलता हुआ जुहू, तथा उप




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