समवायांगसूत्र | Samvayangsutr

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Samvayangsutr by प. हीरालाल शास्त्री - Pt. Heeralal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विवेक है। कितने ही काये परिस्थिति-विशेष से श्रर्थ रूप होते हैं। परिस्थिति परिवतंन होने पर वे ही कारये अनर्थ रूप भी हो जाते है। श्राचायं उमास्वाति*» ने अर्थ और अनर्थ शब्द की परिभाषा इस प्रकार की है--- जिससे उपभोग, परिभोग होता है वह श्रावक के लिये अर्थ है और उस से भिन्न जिस में उपभोग-परिभोग नहीं होता है, वह अनथथैदण्ड है। आचाय॑े अ्रभयदेव*” ने लिखा है कि अर्थ का अभिप्राय “प्रयोजन” है। गृहस्थ अपने खेत, घर, धान्‍्य, धन की रक्षा या शरीर पालन प्रभृति प्रवृत्तियाँ करता है। उन सभी प्रवृत्तियों में आरम्भ के द्वारा प्राणियों का उपमर्दन होता है। वह अ्रर्थदण्ड है। दण्ड, निग्नह, यातना और विनाश ये चारों शब्द एकार्थक हैं ; अर्थदण्ड के विपरीत केवल प्रमाद, कुतू हल, अविवेक पूर्वक निष्प्रयोजन निरर्थक प्राणियों का विघात करना अनथथंदण्ड है । साधक अनर्थदण्ड से बचता है । अर्थदण्ड और अरनर्थंदण्ड के पश्चात्‌ जीवराशि और अजीवराशि का कथन किया गया है। टीकाकार आचार्य अभयदेव ४ ने टीका में प्रस्तुत विषय को प्रज्ञापता सूत्र से उसके भेद और प्रभेदों को समभने का सूचन किया है। हम यहाँ पर उतने विस्तार में न जाकर पाठकों को वह्‌ स्थल देखने का संकेत करते हुये यह बताना चाहेंगे कि भगवान्‌ महावीर के समय जीव और अजीव तत्त्वों की संख्या के सम्बन्ध में अत्यधिक मतभेद थे । एक ओर उपनिषदों का अभिमत था कि सम्पूर्ण-विश्व एक ही तत्त्व का परिणाम है तो दूसरी ओर सांख्य के अभिमत से जीव और शझ्रजीव एक है। बौद्धों का मन्तव्य है कि अनेक चित्त और अनेक रूप हैं । इस दृष्टि से जैन दर्शन का मन्तव्य आवश्यक था। श्रन्य दर्शनों में केवल संख्या का निरूपण है । जब कि प्रज्ञापना सूत्र में अनेक इष्टियों से चिन्तन किया गया है । जिस तरह से जीवों पर चिन्तन है, उसी तरह से अ्जीव के सम्बन्ध में भी चिन्तन है । यहाँ तो केवल अति संक्षेप में सूचना दी गई है 1** बन्ध के दो प्रकार वताये हैं, रागबन्ध और द्व षबन्ध 1 यह बन्ध केवल मोहनीय कर्म को लक्ष्य में लेकर के बताया गया है । राग में माया और लोभ का समावेश है और द्वंष में क्रोध और मान का समावेश है । अंगुत्तर क्‍--++-___+_ण्+-5-ज_+ ८: ८उः निकाय में तीन प्रकार का समुदाय माना है लोभ से, 6 प से और मोह से | उन सभी में मोह अधिक प्रवल हैं।२९ इस प्रकार दो राशि का उल्लेख है | यह विशाल संसार दो तत्त्वों से निमित है | सृष्टि का यह विशाल रथ उन्हीं दो चक्तों पर चल रहा है। एक तत्व है चेतन और दूसरा तत्त्व है जड़ । जीव और अजीब ये दोनों संसार नाटक के सूत्रधार हैं । वस्तुत: इनकी क्रिया-प्रतिक्रिया ही संसार है। जिस दिन ये दोनों साथी बिछुड़ जाते हैं उस दिन संसार समाप्त हो जाता है । एक जीव की दृष्टि से परस्पर सम्बन्ध का विच्छेद होता है पर सभी जीवों की अपेक्षा से नहीं । भरत: राशि के दो प्रकार बताये हैं । द्वितीय स्थान में दो की संख्या को लेकर चिन्तन है । इसमें से बहुत सारे सूत्र ज्यों के त्यों स्थानांग में भी प्राप्त हैं । तृतीय समवाय : विश्लेषण आम बा. तृतीय स्थान में तीन दण्ड, तीन गुप्ति, तीन शल्य, तीन गौरव, तीन विराधना, भृगाशिर पुष्य, श्रादि के तीन तारे, नरक, और देवों की तीन पल्योपम, व तीन सागरोपम की स्थिति तथा कितने ही भवसिद्धिक जीव तीन भव करके मुक्त होंगे, आदि का निरूपण है । ः प्रस्तुत समवाय में तीन दण्ड का उल्लेख है। दुष्प्रवृत्ति में संलग्न मन, वचन और काय, ये तीन दण्ड हैं । जफकफज---र....तह8ह | १७--उपभोगपरिभोगौ अस्याओ्या रिणो5र्थ: । तद्व्यतिरिक्तोड्नथे : । -“0त्त्वाथंभाष्य ७-१६ १८--उपासकदशांग, १-टीका १९. समवायांग सूत्र १४९, भ्रभयदेव वृत्ति २०. जैन आगम साहित्य--मनन और भीमांसा, देवेन्द्रमुनि शास्त्री, पृ. २३९ से २४१ २१. अंग्ुत्तरनिकाय ३, ९७ तथा ६॥३९ [&$ |]




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