आस्था के शिलालेख | Astha Ke Shilalekh

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : आस्था के शिलालेख  - Astha Ke Shilalekh
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about गोपाल जैन - Gopal Jain

Add Infomation AboutGopal Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
पथ चिन्हकोलाहल के दूर एकान्तता में डूब जाता जब मन स्व के निकट श्राकर सोचता मेरी बातचेतना के भ्रतल के सुल जाते चक्षुहो जाता मैं महायृष्ठि का विस्तारअधिक्षत भ्रह चेतना के ढू ढता प्रतिमान प्रामाणिक मैं-वोध के रचता मैं सूत्रचाहता करना सृजित मेरी भावाइति वी प्रतिमा चाहता मेरी पहिचान के शिल्प, पथ और रगहो सके जो मेरा प्रतिरूप और मै का प्रतिमानमैं की अधिकृत भावभूमि पर ही उगते सत्य भर श्रेयस्‌ के बिम्ब दरिदगी का विश्व देता मुझे सतापआत्मघाती ग्रुग करवाता मुभम पआात्महत्यानही होना चाहता मैं पर मेरा शून्यमैं चेतना मे गू जता है मेरा प्रामाणिक जीवन स्वर ही जाता हैं मैं प्रेतीय विश्व का प्रतिरोधनहीं मैं “मैं! का व्याकर्णीय बोधतीड दी है मैंने सम्पूण दोवारेमैं सृष्टि भाव सा अनतमैं हें देह-चेतवागत व्यष्टि इकाईबही है मेरी अनुभूति, विचार और जीवन का केन्द्र उसी मे चाहता हूँ मैं ग्रमृत रस-घारा का कलक्‍्ल चाहता हूँ हर जीवन में पीयूष रस का आप्लावनमैं हें मेरी अस्तित्व समग्रता का प्रतीक ओऔर/ग्सख्य कोपीय प्रक्रियाओं का सश्लेषण19




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now