पञ्चतन्त्रम् प्रथम तन्त्रम् | Panchatantram

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Book Image : पञ्चतन्त्रम् प्रथम तन्त्रम् - Panchatantram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मित्र भेद १७ दमनक आह--मा मेव वद। अप्रधान! प्रधान स्यथात्सेवते यदि पार्थिवम्‌ । प्रधानोः5्प्यप्रधान स्पाद्यदि सेवाविवर्जति ॥ ३५॥ यत उक्त च-- आसन्नभेव नृपतिर्भजते मनुप्य विद्याविहीनमकुछीममसस्क्ृत वा) प्रायेण भमिपतप प्रमदा लताश्व यत्पाश्वंतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ॥३६॥ तथा च-कोपप्रसादवस्तुनि ये विचिन्वन्ति सेवका | आरोहन्ति शने पश्चाद घुन्वन्तमपि पा्थिवम्र्‌ ॥ २े७॥ विद्यावता महेच्छाना शिल्पविक्रमशालिनाम्‌ । सेवावृत्तिविदा चेव नाश्नय पाथिव विना ॥ रे८ ॥ ये जात्यादिमहोत्माहानचरेन्द्रान्नोपयान्ति च॑। तेपामामरण भिक्षा प्रायश्वित विनिमितम्‌ ॥। ३९ ॥ ये च प्राहुर्दुरात्मानों दुराराष्या महोभुज ! प्रम॒दाएलस्प॒जाड्यानि ख्यापितानि निजानि ते ॥ ४० ॥ दमनकने कहा-- ऐसा मत कहो?॥ यदि राजा की सेवा करे तो अप्रधान प्रधान हो जाता हैं और सेवा से पराइमुख हो तो प्रधान भी अप्रघान हो जाता है ॥ ३५ ॥| कयोकि कहा भी है-- राजा अपने समीप के ही मनुष्य को मानता है, चाहे वह विद्यारहित, अकुलीन अथवा सस्कार-रहित ही क्‍यों न हो ? प्राय राजा स्त्री और लताये जो समीप में रहता है, उन्ही का परिवेष्ठन करती है ॥ ३६ ॥ ओऔर भी--जो सेवक लोग स्वामी के क़ोघ और प्रसन्नता के कारण पर सनन किया करते हैं, वे धीरे-घीरे प्रतिकूल राजा के यहाँ भी ( उच्च पद पर ) अपना स्थान बना लेते हैं ॥ ३७ ।॥॥ विद्वान, कारीगर एवं पराक्रम से युक्त और सेवावृत्ति के जानने वाले लोगों , का राजा को छोड कर--अन्यत्न कहीं आश्रय नही रहता ॥ ३८ ॥ जो अपनी जाति आदि के गौरव के कारण राजा के समीप नही जाते उनके छिए मरणपय॑न्त मिक्षा माँगना ही प्रायश्चित्त कहा गया है ॥ ३९॥ जो दुरात्मा यह कहा करते हूँ कि “राजा बडी कठिनाई के द्वारा आराघना र२प० भि०




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