सिद्धभेषजमनीमाला | Siddhbheshajmanimala

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Siddhbheshajmanimala by लक्ष्मीराम स्वामी - Laxmi Ram Swami

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about लक्ष्मीराम स्वामी - Laxmi Ram Swami

Add Infomation AboutLaxmi Ram Swami

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
गुच्छ ] प्रथमो गुच्छः । सो5हं संप्रति सिद्धभेषजमणीनाहत्य मालामिमां गुम्फासि स्फुरद्चछगुजछरूचिरां विद्वक्धिपक्प्रीतये ॥ ५॥ श्रीकष्छवाहकुलपुष्करचित्रभानुमानो वर्भूव न्पतिः प्रथिताभिमानः । यः काव्वुलावधि विजित्य महीं महाव्धावक्षालयद्‌ द्विपषद्खकलुष कृपाणम्‌& तस्यान्चये समभवज्ञयसिहवर्मी घर्मादरः समधिकं हयसेधकर्मा । उच्चेश्च तुष्पटिविचित्रचतुष्पर्थ यः शिविपित्रजजयपुरं' परम व्यधषत्त ॥ ७॥ जातस्तस्यान्ववाये मह॒ति महितधीदृ्‌पणध्वंसदीक्षें श्रीरामः प्रोहकामः सुकृतम तिरखत्सम्प्रदाय प्रमाथी । बैद्य - समाज की प्रीति के लिये, सिद्ध - भेपज्ञ रूपी सणियों को एकन्नित करके - समुज्वछ निर्मल - गुच्छों मे विभक्त इस रमणीय - माछा की रचना प्रारभ करता हूं ॥ ५ ॥ परम - सनखी मानसिंह - भूपति, श्रीकच्छवाह -वंश - कमल के किये साक्षात्‌ सूर्य के समान थे-जिन्दोने काबुरू-परयत- प्रथ्चीपर विजय प्राप्त करके शन्नुओ के रक्त से रजित अपनी क्ृपाण को महासमुद् मे धोकर ख्च्छ की थी ॥ ६ ॥ इनकेही वेश में श्रीजयसिद्द वर्मा उत्पन्न हुये। धम में प्रगाढ-श्रद्धोपेत इन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया था । कुशल शिल्पियों द्वारा सुंदर - चतुष्पयों से समन्वित, दीध राजमार्ग चाले रमणीय नगर जयपुर का निर्माण इन्होंने ही किया ॥ ७ ॥ इसी महावंश में, उत्तम - प्रतिभा - सपन्न, पुण्य - मतिवाले, असत्‌ संप्रदाय के विनाशक, दूषणरूपी दूपणासुर के सहार मे कृत-निश्चयी, लोक के योग -क्षेस की १-अनेन प्रेक्षावत्प्रतत्य4मभिषेयोक्तिस्तवा भिषक्रप्रसाद, प्रयोजनम्‌ । मुख्यप्रयो- जनमनायासेनारोग्यमित्यपि ज्ञेयम्‌ू । २-सूर्यः। ३-श्रीमानसिह । अरय॑ च महावीर- तया जगत्प्रतीत श्रीमद्करशाहदिल्लीदुश््यवनस्थ प्रधानसेनापतिः कच्छवाहवंशमहाकाब्ये सपरिवारो वर्णितः । प्रसप्नात्त्रत्य कश्विदेक 'छोक विलिख्य दशेयाम --- मातुं मानमहास्यतीव न गुरु प्रोढोइपि सन्‌ स्वर्गुरु सा गीगायति कि तु नान्तमयते काव्यस्थ कक्षा कुत । वल्मीद्वीपभवी कवी तु जरठी का माहशाना कथा यत्सख्य[कलन - क्रियासु विऊल शेषो5पि शिष्यायते ॥ इत्यश्मसगममाप्तो श्रीगुरुक्ततिद्र एव्येति । ४-अयमपि तन्रैव महाकाव्ये दशमेफ़ादशसर्गयोः सब्यास वर्णित: 1 यथा-- “राज्य वर्धितमाहवेषु विजितं खच्छे यशोज्प्यर्जित शिल्पिक्षण्णमयस्मय जग्रपुर निर्माय विख्यापितम्‌ । येनायाजि तुरहइमेवविधिना द्रव्य द्विजेस्यो5पिंत सोच्य श्रीजयर्सिदवीरनृपति स्थात्‌ कप््य वास्गोचर ।” इत्यलम प्रस्तुतेन । ५--अस्य पुनर्वणैन जयपुरविलासे द्रष्टव्यमू ॥ ६-व्यधापयत्‌ 1 ७-दूषणध्वसे दूबषगनामरक्षोविनाशे दीक्षा यस्य स तथा। एतेन भ्रीरामचन्द्रौ पम्य ध्वनितम्‌। (िएं




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now