सलोचन ध्यानलोकः | Dhyanalok

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
37 MB
कुल पष्ठ :
618
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)डे पलोचन-ध्वन्यालोकःमधुरिपोदंखा: वो युष्मान्व्याख्यातृश्रोतृख्रायत्ताम, तेपामेव सम्बोधन-
योग्यत्वात्; सम्बोधनसा रो हि युष्मदर्थ,, च्राणं चाभीए्टलाभ्॑ प्रति साहायकाचरणं,
तच्च तत्यतिद्दन्द्रविष्नापसारणादिना भवतीति, इयदत्र त्राणं विवक्षितम,
नित्योद्योगिनश्व भगवतोउ्सम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहप्रतीतेवीररसो ध्वन्यते,
नखानां प्रहरणत्वेन प्रहरणेव च रक्षणे कतंव्ये नखानामव्यतिरिक्तत्वेनभधु के शत्रु ( विष्णु ) के नख आप सभी व्याख्याता और श्रोताओं की रक्षा करें,
क्योंकि वे ही ( व्याख्याता और श्रोता ) सम्बोधन के योग्य हैं । 'सम्बोधन! युष्मत्
शब्द के अथ्थ का सार ( प्राण ) है ( सम्बोध्य पदार्थ की उपस्थिति में ही युप्मत्” या
आप--तुम का प्रयोग होता है )। और, च्राण ( रक्षण ) अमीष्ट के लाभ के प्रति
सहायता प्रदान करना है और वह ( सहायता प्रदान ) उस ( अमीष्ट लाभ ) के प्रति-
इन्द्दी विध्तों के अपसारण आदि द्वारा होता है, रस रूप में यहाँ त्राण विवक्षित है ।*
नित्य उद्योगशील भगवान के असम्मोह और भध्यवसाय से युक्त होने के कारण उत्साह
की प्रतीति होने से वीररस ध्वनित होता है ।* नखों के प्रहरण ( प्रहार के साधन )का रचयिता कौन दै,ऐसे प्रइन उपस्थित होते हैं । यत्र-तत्न लोचनकार ने 'मूलकृत”, कारिकाकार!
और “बृत्तिक्ृतः रूप में व्याख्यान किया है। लेकिन प्राचीन मान्यता यही रही है कि आनन्दवर्धन
ही मूलकार और बृत्तिकार स्वयं हैं। छोचनकार के उल्लेख के अनुसार प्रस्तुत मन्नल्इलोक को
वृत्तिगन्थ के रूप में ही छापने की पद्धति चली आ रही है, मूलकारिका यन्थ को मोटे अक्षरों में
छापा जाता है ।कारिकाकार और वृत्तिकार को अभिन्न मानने वालों का एकतकी यह भी है कि यदि
कारिकाग्रन्थ का कर्ता कोई दूसरा होता तो निश्चय ही वह अपनी ओर से मज्ञलाचरण प्रस्तुत
करता | यद्यपि इसके विपरीत एक यह भी युक्ति दी जा सकती दँ कि 'काव्यस्यात्मा ध्वनि? इस
प्रयोग से कारिकाअन्थ का आरम्म करके निश्चय ही वस्तुनिर्देशात्मक मकृल किया गया है, क्योंकि
काव्य भी “शब्दमूर्तिघर भगवान् विध्णु का अंश? माना जाता है । ऐसी स्थिति में यह भी एक
मकार का मजछाचरण हो जाता दे। अस्तु, मूल कारिकाकार और दृत्तिकार के भिन्न अथवा
अभिन्न होने का विचार प्रामाणिक और त्क॑पूर्ण ढंग से 'भूमिका' में आकलनीय है ।१, अभीष्ट व्याख्या श्रवण ही अस्तुत प्रयास का फल दे, और यद्द तभी सम्भव है जव व्याख्याता
और ओतृबग दोनों त्राण (रक्षा ) प्राप्त करें । फलतः च्राण उनके अभीष्ट छाम का सहायक
सिद्ध होता है। वह भी इस कस में कि उसके द्वारा समग्र प्रतिद्वन्द्दी विध्नों का अपसारण
आदि कार्य होते दे । इस प्रकार यहाँ भगवान् मधुरिपु के नख त्राणया रक्षा करें अर्थात् अभीष्ट
व्याख्याश्रवण के प्रातिहृन्द्री रूप में उपस्थित होने वाले सभी प्रकार के विध्नों का अपसारण करें
यह दृत्तिकार का अभिप्रेत अर्थ लोचनकार के मत में प्रकट होता है । ह९. अस्तुत काव्य आत्मभूत ध्वनितत्व का मूलतः प्रतिपादन कर
है कि अन्थकार अपने मद्नलाचरण में ही ध्वनि? के
लोचनकार ने यहाँ रस, वस्तु और अलदूार के;
ध्वनियों में प्रधान रसध्वनि की चर्चा में कहते
उत्साद की प्रतीति होती है और उत्सा
भगवान् मधुरिपु अपने नखों द्वारा त्राणता है, अतः यह स्वाभाविक
प्रधान रूपों का निर्देश करे। इस उद्देश्य से
ध्वनित होने का प्रकार बताया है। सर्वप्रथम
हैं कि यहाँ वीर॒रस ध्वनित होता है क्योंकि
हद ही 1 का स्थायीभाव है। उत्साह इसलिए कि
कार्य में नित्य उद्योगशील हैं, एवं उनमें किसी प्रकार का
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