श्री ढाईद्वीप पूजनविधान | Shri Dhai Dwip Poojan Vidhan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
11 MB
कुल पष्ठ :
360
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्री अढाई-द्वीप पूजन विधान । [ १५न्स््ख्टर७ ५७७, २७७५७ ७७ ७५ ७०७७७ ५ औ ७ ५५७०५२ ७५३७७ ५ ७२२७७७४७ २७ २५७४ ७७ ७ औ ५७ ७ ५५ रस,५
अथ वनचतष्टयास्थतर्चयालय एजा।
अडिल्ल छन्द् हु
पांइक बन सोमनस तथा नंदन भनो,
परो भूमि पर भद्रशाल चौथो गिनो ।.
पोडश जिन चेत्याले तिनमें शुभ राज ही, व
तिन आह्वानन करत दुरित दुख भाजही ॥३६॥
३5 हीं पांइकवनस्थित पोडृश चेत्यालयस्थित जिनसमृह
अन्रावतरावतर अन्न संबोषट्, तिप्ठ तिष्ठ 5: 50, अन्न मम सन्नि-
ईहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं ।
श्रीपांइकवन पूजन चेत्यालय विषे,
अष्टोतर शत्त प्रतिमा जिन श्रुतमें लिख ।
पंच शतक धनुपोत्तर तन जिनको क्यो,
तिनपद पूजन वसुव्रिधि मन हरषित भगो॥ ३७॥
3 हीं पांइकवन पूवरोदिक चेत्यालयस्थित जिनेभ्पो अधे ।
श्रीपांइकवन दक्षिण जिनमेदिर सही,
बसु शत प्रतिमा तामें शुरु गौतम कही |
तिनके चरन जजों तन मन हरपायकै,
जल फलादि ले वसुविधि अबे बनायके॥ ३८॥
' ऊ#* हीं दक्षिगदिव पांडुकनस्थित जिनमंद्रि जिनेम्यो अबे।
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