कृतिकार एवम् कृति | Kritikar Avem Kriti

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Kritika Avem Kriti by प्रभात शास्त्री - Prabhat Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भू कृष्णामदद कवि कृत 'सहृदयानन्द” के छन्द उदाहरण रूप में उद्धृत किये गये हैं, एव रस के सम्बन्ध में धर्मदत्त के मत का उल्लेय है 1? इन प्रन्थकारो का स्थिति-काल ( क्ृष्णानन्द तथा धर्मदत्त को घोडकर ) १२वीं शती के भध्य है, यह सर्वबिदित इतिहास है। 'कृष्णातर्द! कवि सम्मवत विश्वताथ के समकालिक एवं उनके तद्देशीय थे | वे भी विश्वनाथ की तरह किसी नृपति की राजप्रभा में स्रान्धिविग्रहिक-पद पर नियुक्त थे, उनके महाकाव्य की पुष्षिका में इसका उल्लेख हैँ--'इति श्री सान्बिविग्नहिक सकलकेवि--कुलमोलिंमएडन .श्रोकृष्णानन्द- कृत सहुदयानन्द महाकाव्ये “| कलिंग नरेश चतुर्थ का एक ताम्रपत्र मिलता है जिसमे 'हृष्णानन्द स़रान्धिविग्रहिक महापात्र' का उल्लेख है? ताम्रपत्र का समय वहो हो सकता है जो तरसिहदेव चतुर्थ का शाततकाल--१४१४ ई० है। ये कलिंगनरेश नरसिंह चतुर्थ १४वी शती के उत्तरार्द्ध से १५ वो शती के प्रथम शतक में शासनारढ थे ।* झ्रत 'सहृदयानन्‍्द' के 'रचयिता हृष्णानन्द की कलिंग में ही स्थिति होने के कारण उतका कविराज विश्ववाय के समकांल होना बहुत सम्भव हैं जिसके कारण उन्होने अपने समकालिक परिचित कवि के धन्द को 'साहित्यदर्पण” में उद्धृत किया, क्योकि 'सहृदयानन्द' “गीतगोविन्द' 'नैषधीयचरित' के समान ऐसा प्रथित महाकाव्य नही था कि उसका उल्लेख सामान्यतया लक्षण- प्रन्‍्थों मे किया जाता । #ष्णातत्द नरसिंह चतुर्थ की सभा में थे, नरपिह चतुर्ष का समय १४वीं शती उत्तरार्द्ध हैँ, प्रत कृष्णानन्द के कृतित्व का उल्लेख १. बही परिच्छेद 1 २ तदाह धर्मदत्त स्वप्रस्ये-- रसे सारश्चभंत्कारः सव व्राष्यनुभूयते, तच्चमत्कारसारत्वे सब ब्राप्यदरभुतों रस, तस्मावृदभुतमेवाह छृतो नारायणो रसम्‌॥ +साहित्यदपंण परिच्छेद ३। ३, “सत्र विजय समये पाशवें सहापान्न कृष्णानाद सात्धिविग्रहिक महारत्र लाप्ड्रय झ्राचार्य, महापरान्न गोरीनाय सान्धिविप्रहिक...। इ. शिस्फिप्टिद कैटलाग--संस्कृत मेनुस्करिप्टूस घ्राफ उड़ीसा यु० ७४ ।




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