वोल्गा के दर्पण में गंगा के चित्र | Volga Ke Darpan Mein Ganga Ke Chitr

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Book Image : वोल्गा के दर्पण में गंगा के चित्र  - Volga Ke Darpan Mein Ganga Ke Chitr
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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था मौन अब ब्राह्मणफिर घर को जा रहा थामानो भरी हुई थीदुसमय खुशी-सी मन मेंमानो वह देखता हो अब भी शकुन्तला की आँखों से बहते आँसू ।[31गम्भीर-सा, दुखी-रा चिन्ता से ग्रस्त बूढ़ा जंगल में घूमता थारह-रहके आ रही थीबूढें को याद विपदारानी शवुन्तला कीइक वार फिर अचानकसीमा पे युद्ध भड़कापूरब पे राज करने की कामना लिये अब पश्चिम दिशा से उदूठा था बेरहम लड़ाकू बेताब जंगबाज़ो के झुण्ड साथ लेकरथी अपनी साज्िशों मेउसने सफलता पायीडूबा हुआ था ग़म मे फिर आज मानो भारत रानी शकुन्तला औ' विक्रम के वास्ते अब बुढ़ा दुआएँ करता दिन-रात ईश्वर सेबेकार थी दुआएं,अब युद्ध बाढ़ बनकर पहुँचा था उस जगह पर था जिस जगह का वासी वह बूढ़ा ब्राह्मण भी चारो तरफ़ ही मानो इक लूठ-सी मची थी होकर हताश बूढ़ारहने लगा था जाकर अब दूर पवंतों मे बैज्ञार हो चुका था मानव की शक्ल से भी दुख से था भारी सीनाथी मन में ब्राह्मण केअब मौत की तमन्नापूरी न हो सकी थी बूढे की कामना यहयोल्गा के दर्पण में गंगा के चित्र / 25




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