पुरवैया के नूपुर | Puravaiya Ke Noopur
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1 MB
कुल पष्ठ :
150
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)में नियति, भगवान् दोनों से रहा झूठा
उछल रहे हें यह मनुज को रौव दे भूठा,
पंगु दुनिया से न मेरी निभ कभी पाई--
है बहुत क्षमता मगर तुम में निभाने की !
शवित है तुममें मुझे अंपना बनाने की ॥
रूप देखा, रूप का संसार भी देखा,
रूप वालों का घिनौना प्यार भी देखा
अति मथुर मुस्कान अधरों पर सुखा डाली--
हूँ तुम्हें चिन्ता उसे फिर से जिलाने की !
शवित है तुममें मुझे अपना बनाने की ॥
_>नीड़ के निर्माण में सहयोग में दूंगा,
प्यार का तुमको नश्षीक्ा रोग में दूँगा,
साधना की शक्ति लेकर भक्त की प्रतिमे---
हैं तुम्हारी चाह पत्थर की गाने की |
शवित हूँ तुम में मुझे अपना बनाने की ॥
यदि मुझे फिर गगन की छहरें बुलायेंगी,
विजलियाँ भी कर इशारे भुस्करायेंगी,
सह सकूँगा किस तरह प्रिय मान मे उतका---
छोटने पर क्या सजा दोगी रुछाने की ?
शक्ति हैं तुममें मुके अपना बनाने की ॥
पुरतरैया के नूपुर
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