बर्हदअर्नायपनिषद भाग दूसरा | Brhadarnayakopanishad Bhag-ii

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Brhadarnayakopanishad Bhag-ii by उमेश चन्द्र मिश्र - Umesh Chandra Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( पाँच ) स्वामी जी महाराज की व्याख्या विशेषल्‍ूप से मनन करने योग्य है भाष्य के जिम स्थलों को झ्रानन्दन्दगिरि टीका सविस्तर नही कह पाती, उमे यहाँ स्पष्ट करे का प्रयास किया गया है। चतर्थाष्याय के चतुर्थ ब्राह्मण मे मरणामन्न जोव की दशा बतलाकर बरीरान्तर गमन को इष्टान्तो के द्वारा समभाते हुए “तत्त्वज्ञानी का उत्क्रवण नडी होता -यह स्पष्ट किया गया है। इस भ्राह्मण मे सुरेश्वराचार्य जी के वार्तिको का पर्याप्त उपयोग किया हैं. साथ में टिप्पणकार ने श्ास्त्र- प्रकाशिका टीका को भी लेकर वेदान्त तत्त्व के जिज्ञासुश्रो एवं शोधकर्ताम्रो के लिए महाब्‌ उपकार किया है। श्रथम भध्याय के चतुथे ब्राह्मण की तरह चतुर्थाध्याय का चतुर्थ ब्राह्मण भी सम्पूर्ण वृहृदारण्यकोपनिपत्‌ का प्राण है । इसमे शद्छू राचाये जी ने भ्रद्वेत वेदान्त के ज्वलन्त विषयों को, जिन पर अन्य द्वेतमतावलसम्बी सदा भ्रहार करते रहे हैं, शास्त्र एवं तक॑ द्वारा सुक्ष्मे क्षिकया सविस्तर विशद विवेचन किया है । एक स्थल पर प्रद्वेत के प्रति सुदृढ़ निष्ठा की प्रभिव्यक्ति करते हुए भाष्यकार लिखते हैं-.- “वस्मात्कामयसान एवंवं ससरत्यथ तस्मादकामयसानों न परथचित्संसरति। .... ....यस्‍्य सर्वेमात्मेवाभूत्तत्केव क पदयेच्छणुपान्मन्वोत विजानोपाद व विजानस्क कामयेत । ज्ञायमानों हन्य- स्वेन पदार्थ: काम यितव्यों भवति । न चासायस्यों ब्रह्मविद ग्राप्तकाप्तस्यास्ति )......न॒ हि यस्या55वमेव सर्व भदति ततस्पानात्मा फाममितव्योपह्ति । प्रनाह्मा चास्य फाममितब्य, सर्वे चात्मंवाभूदिति विप्रतिषिद्धम्‌। सर्वात्मदर्शिनः फ्ामपितव्याभावात्कर्मानुपपत्ति ” 1 (बृ.उ दा भा ४-४-६ पृ १२१३-१५) द्वंतदर्शी की स्थिति कल्याणकारक नही' इस प्रसद्भ मे श्ड्भूराचायं जी रढतापूर्वक कहते हैं कि अविद्याजनित अध्यारोप से भिन परमार्थत ढवंत नही है,क्योकि ब्रह्म मे द्रष्टृद्रप्टव्यादि भाव से नानात्व भेद नही है-- त्तन्र व दर्नविषये ग्रह्मटा नेह नानाध्ति किचन किचिदवि। झसति मानात्वे नानात्वमध्या- रोपयत्यविद्यया । स मुत्योमरणान्मृस्यु' मरणमाप्नोति । कोइसी । य॑ इह मानेव पश्यति। प्रविद्या: ध्यारोपणब्यतिरेकेण मास्ति परमार्थतो द्वेतमित्ययें / । (बू उ डडा?८ पृ १२६१-६२ ) प्रकरणवज्गात्‌ शड्धूराचार्य जी एक स्थल पर श्राग्रहपूर्वक स्पष्ट करते हैं कि सोपाधिक ब्रह्म ध्यान से मात्र भ्रस्युदय प्राप्ति होती है, केवल्य पद तो निरुपाधिक ब्रह्मज्षान से ही मिलता हे । बह ब्रह्म महान्‌ अजन्मा है, जीर्णता या विपरिणाम को नहीं प्राप्त होता है जन्मादि विकारों से वर्जित है, सब श्रोर व्याप्त है एव प्रभयस्वरूप है 1 बृहदारण्पक उपनिपतु के पन्चम एवं पष्ठाध्याय का खिलकाण्ड की सछ्ज्ा दी गई है। पूव अनुक्त परिशिष्ट खिलशब्दवाच्य है, वस्तुत निरुषाधिक किन्तु प्रतिया हारा सोपाधिक आत्मा की उन [त्रिविध) उपासनाओ, का जो पहले वर्णन नही की गईं है जो कमे की समृद्धि के लिए है, प्रकृष्ट प्रम्युदय को साधन तया क्रम मुवित की प्रापिका हैं, उनका इसमे वर्णन है । क्योकि प्राणा की द्वेत मे प्रारम्भ से हो मिथ्यात्त बुद्धि नही होती, इसलिए ऐसे पुरुष को शास्त्र पहले कर्मकाण्ड रूप साधन का उपदेश करता है । उसके पश्चात्‌ कैवल्य स्थिति के इच्छुक मुष्रुक्षु के लिए थुत्ति अह्मविद्या का उपदेश करती है । दान्त, नि्तोभ्ी और दयालु हाने पर ही साघक का सव उपासनाओं में अधिकार होता है | सोपाधिक ब्रह्म की उपासनाएँ अ्रम्युदयफलक हैं ।




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