उपासक दशांग सूत्रस्य | Upasak Dashang Sutram

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1153 Upasak Dashang Sutram by घासीलाल जी महाराज - Ghasilal Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना 6 है, #मउराप+»,. ध८हाता हक । 0) प्रि । यज्ञननो! अनादि संसारचक्रमें परिभ्रमण करते हुए प्राणीको (हद पदि कोई वस्तु दुलेभ है तो केवल धर्मही दुलेभ है; वह धर्म हे कि )> न दो भकारसे वर्णित हे जैसे श्रुतरूपसे ओर चारित्ररुपसे । ५2४ फिर भी चारित्ररुप धर्म दो प्रकारसे माना गया है देशचारित्र- रूप धर्म ओर सर्वेचारित्रर्प धर्म | अरब शाह देशारिलकय बंका आन रितिक हंस मे पढ़े महल शास्तम देशचारित्ररुप धमेका वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिसे भी बड़े मह्व॒का है। साथही उपासकों ( श्रावकों )की दशा केसी होती है, उस समयके उपासकों का आचार व्यवहार कैसा था !, तत्कालीन जनता किस मार्गानुगामिनी थी ! इत्यादि विषयोंका पता प्रस्तुत शास्तके अध्ययनसे भलीमाति छंगनाता है। मेसेकि-इस शास्तके प्रथम अध्ययनमें आनन्द नामक ग्रहपतिका सूत्ररूपसे नो जीवनहत्तान्त दिया है उसके अध्ययनसे इस समयके पूरे अढाई हणार वर्ष पहिछे इस भारत वर्षकी रचना कैसी थी ?, किस प्रकारका भारतवर्षका कलाकोशल बढ़ा पढ़ा था [, तथा व्यापारका सम्बन्ध विदेशोंके साथ केसे चलता था !, नगर किस प्रकार निर्माण कियेजाते थे ?; नेसेकि-वाणिज्यग्राम नगर वनों ओर उपवर्नोंसे सुशोमित हो रहा था, जिसका वष्म, कोट शिल्पियोंद्वारा निर्माण किया हुआ था, नागरिक व्यवस्था वास्तुक विधाओंके विशारदों द्वारा रचित थी । वहां जितशनुनामक राजा न्यायपूर्वक प्रमापर शासन करता था। इसकी शखशाला, कोष तथा चतुरंगिनी सेना सुरक्षित तथा दिन प्रतिदिन हृद्धि पा रही थी। नगर धन ओर थधान्य तथा ऋद्धिसे युक्त था। आनन्द नामक ग्रहपति इसी नगरके महाराजाके मान्य सदूगृहस्थ इसी नगरमें निवास करते थे। उनका व्यवहार आर्यौवत्तेके अतिरिक्त अन्यविदेशोंके साथ भी था | उनके चार जहाज चारों दिशाओंमें घूमते थे, वह नगरमें सुप्रतिष्ठित और प्रत्येक नगरनिवासियोंके |




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