गोम्मटसारः | Gommatsar (jeevkand)

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Gommatsar (jeevkand) by खुबचंद्र जैन - Khubchandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ रायचन्द्रजनशाखमालायाम 1 और भी-“अजजसणगुणगणसमृहर्सधारि अजियसेणगुरु । भुवणगुरु जस्स गुरु सो राओ गोम्मटों जयड ते अथीत चह श्री चामुण्डराय जयबँत्ता रहो कि जिसके गुरु अजितसेन नाथम कऋद्धियाप्त गणधर ठेवा- दिकोंके गुण पाये जाते है ॥ आचार्य श्री आर्यसेनके अनेक गुणोके समूरको धारण करनेवाले तथा तीन लोकके गुर अजितसेव शुरू जिसके गुरु हैं वह गोम्मट राजा जयबंता रहे ॥ पं ि इससे यह धात माहम होती है फि जिन अजितसेन खामीका उद्लेल बाहुचर्जी 5 आर गोमह- सारमें किया गया है वे एक ही हैं। परठु ये अजितसेन कब हुए इस बातका कुछ पता श्रवणवेल्गोलाऊ एक छिलालेखसे मिलता है। उसमें अजितसैनके विपयमे लिखा है किः-- गुणा; कुंदुस्पन्दोडुमरसंमर| वागमतता$, पुवआय; प्रेय;प्रसरसरसा कीतिरिव सा । नखेन्दुज्योत्खाइम्रेनेपचयचकोरमणयिनी, न कासां जहाघानाँ पद्मजितसेनो त्रतिपतिः ॥ यह शिझालेख करीब ग्यारहमी शदीका खुदा हुआ दै। इससे माछुम होता ई कि श्री अजितसेन खामी ग्यारहमी शदीके पूर्व हुए हैं, और उसी समय श्री चामुण्डराय भी हुए हैं। परंतु पं. नाथूरामजी प्रेमी द्वारा लिखित “चैद्र॒प्रभचरितकी भूमिका'में श्री चामुण्ठरायके परिचयमें लिखा है कि कनडी भाषाके प्रसिद्ध कवि रत्नने शक सम्बत्‌ ९५१५ में 'पुराणतिलक' नाम्रक अंथवी रचना दी है और उसमे आपको रक्‍्कस गंगराजका आश्रित्त वतछाया है। चाझुण्डरायकी सी अपनेपर विशेष कृपा रहनेका दह जिकर करता है ! इससे मालम होता है कि शक सं. ५१५ या विकम स, १०५० के लगभग ही श्री बामुण्डराय॑ और श्री अजित्तसेन खामी हुए है शोमध्सारकी श्री चासुण्डरायकृत एक कनोटक वृत्ति श्रीनेमिचंद्र ते. चंकवर्तीके समझ ही वन जुकी भी बस श्री केशववर्णीकृत संस्कृत टीका भी है उसकी आदिम लिखा हुआ है कि --- ४ बह व शाला पिता वा लिश नहा ति लि: ल्द्तर्गंगवंशललाम-राजस्वेज्ञाइनेकगुणनामघेयभागधेय-भ्रीमद्रा जम छदेवमही चछुसमदामाल्यपद्विराजमान-रणरह्ममहासहायपराक्रम-शुणरलभूपण-सम्यक्त्वरल- निलयादिविविधगुणनामसमासादितकीर्तिकांत-भीमच्ाामुंडैरायप्रश्नाचतीणैकचत्वारि- शत्पद्नामसत्वप्ररूपणद्वारेणाशेषविनेयजननिकुरंवर्सवोधना थे भ्रीमन्नेमिच॑द्र सैद्धान्तिक- बाग कलश मजा समस्तसैद्धान्तिकजनप्रख्यातविशद्यशा पर ३ £ विशालमतिरसोी भगवान ... ... केबल खत प्रपेंचमारचय बेघतः शास्रपरिसमापतिनिमित्तं देघताचिशेष॑ नमस्करोति | बा अ राचयक और रकक्‍्कस गंगराज ये दोनों ही भाई थे। उपयुक्त गोमहसारकी पक्तियोसे या अर मिखित का बस तीनोही समकालीन है। न पा ७ जाती » 5 अंत एवं यह खर्य॑ दे मेमि चंद्र सिद्धातवक्वर्तीका भी होना चाहिये 5३ स्व दिड्ध है कि यही समय चासुण्डराय तथा भी लेसि- हो




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