सन्मति - सन्देश | Sanmati Sandesh

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
552 KB
कुल पष्ठ :
102
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)घने [ १६3५८ 0.+>०2५2०७८५3२3५३५-+३२०तभ कट ल्ज सर रजल् जी 0 बल जा३२जय तक बुटापा नहीं सताता, जय तक ब्वाधियाँ नहींउल्ती, जब तक इच्द्ियाँ दान, श्रश के पही होती तय तक
प्रम॑ का झ्राचरण कर लेता चारिए ।
2३
जो प्रथिक विना पायेव लिये ही लम्बी यात्रा पर यल
पड़ता दै, वह आरा छाता हुआ भूल तथा प्यास से पीड़ित
होकर द्र्यत दुष्खी हाता है
3 4इणा प्रवार जो मनुष्य विना घर्मोचरण किये परवीकजाता है बह भी यहाँ नाना आदिच्याधिर्ण़ से पीड़ित
दोकर श्रय॑त दु सी होता दै ।
३्घ.ढ
जो प्रभिक लग्बी यात्रा में शत साथ पायेय लेकरचनतता है, वइ आग चलकर भूस और प्यास स तनिक भी
पीड़ित न होकर अस्पन्द छु्ी शेता है।2४च>०+3त >> + पट २>र५स से ।
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