जैनसंघ ग्रंथमाला | Jain Sangh Granth Mala

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Jain Sangh Granth Mala by जैनसंघ - Jainsangh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भा० २३ ] पयहिसकमभेदशिदेसो १४ ६ ३१, मंपहि चउप्समेदर्सि मंकमगा्ण मज्णे एयटियंकमम्स नाव भेदपरदृप्पायणहु- मृत्तरसु चमाह--- जन पयटिसंकम ५ 2 2 कक 2० हरे छ्टि ल्‍ डेट्ाए- & पयडिसंकमो दुविहो | त॑ जहा - एगेगपयडिसंकमों पयडिट्ठा संकमो हे ५ । न ० ० न क ह ३२, एत्थ मलपयश्सिकमों णत्थि, सहावदों चेव मलपय्टोणमण्णोण्ण- विसयमंकंतीए अभावादो । तम्हा उत्तरपपडिगंकमों चेव दुविों सुर्ते परूबितों । तत्थे- गेगपयटिसंकर्मा णाम मिन्छनाडिपयडीणं एस पृथ णिरंमणं काऊुण संकमगपेसणा । भू ० अर कं ताओओं ख ७ 4 तहा एकम्य समए जसिशण्ण पवडीणं मंझुममंगवी ताज रड़ो काऊण गंकेसपरिकसया पयटिद्वाणमंकमी! भण्णट; ठाणसहस्स समृदायवानयस्य गहणादों। शड़मुभयप्पयं पयडिसेकर्म ताव घच्तइस्सामो' लि जाणावणडूमुवर्मिसु सं भणइ--- 8 पयलिसंकरम पयर्द | /ा ३ ५ ह मेड कक +ि ह्मंकम | हा ; ३3३, परयटि-द्विद्ि-अगुभाग-पदनमंकमार्ण मज्य पयटिसंकम ताव पसदमिदि पेष अधिझणेडी भी यट दिधि मिठ दी णाती है, पसः अस्यत इस रुपसे प्रस्पणा नं थी है । विशेषार--पि सी भी शासे प्रास्मामे दपहम, गिद्येय, लय और अनुगस श्स घारपा स्यास्यान करना ्ययध्यर है। इससे उस शापरमें उश्िस रिपय और ब्सके अधिकार ादियश पा क्रम जाता है। इसी दृष्टिसे घृर्टिसूअरारने रस चांस्या सपने 'अगशनतर भेद्ीके साथ यहाँ धर्मन किया एि तथापि संग के भार अर्थाधित्वार एनलागे हैं थे ही झमुगम व्यपदेश्षफ्ों प्राप्त दोहे हैं. ऐसा या जानना चादिये। या पर अन्‍्यमे यह थी फ्री गई है हि संकमके प्रास्ममों जमे इन इपन्ग आदियां पर्णन जिया £ उसी प्रकार जग्य पशरोसनिहनि चाहि चोद अधियारेंकि आरसाम दनया बर्णन क्‍यों महों। त्या। दीकायारने उसया जो समावान किया रे च धि + ०. अ. क नम ता रे ० 5 है उसका भाव यद है कि नेसे सषदे रखा हुथा दीपक आगे चोर वीड़े सर्वश्न प्रयाश देता: बसे ही यह महाविकार सबके मध्यमेईट अ्रत घटा उसता इछ्लोस पर ऐनेसे सर्वत्र थे 'प्रपने अपने अभधियारके नामानाव्प जान ढेने चादिए । ५३१, अगर उन चारों संफमेंगिं आये हुये प्रृतिसंक्रम्फ भेद दिखलानेके लिये घागेका सूत्र कहते (5 ई ३. श् प्रकृतिस्थानसंक्रम £ प्रक्ृतिसंक्रम दो प्रकारका हैं। यथा--एकेकप्रक् तिसंक्रम और प्रकृतिस्थानसंक्रम । ६ ३०, यहाँ पर मूल अद्धतिसंक्रम नहीं है, क्योंकि रफ्माथसे दी मूल प्रकृतियोका परस्परमें संक्रम नहीं होता, इसलिये सूतमें उत्तरप्ररृत्िसंक्रस ही दो प्रकार बतगाया है। उनमेसे 5५ क. श, & मिख्याल प्रादि प्रकृतियोंसा प्रवक प्रवकू संक्रमका विचार करना ए्केफ्रफ्ृतिसंकम कदलाता है। तथा एक सगयगे जितनी अद्धतियोद्ा संक्रम सम्भव्र है इनको एकत्रित करके संक्रमझा विचार फरना द्तिस्थानसंक्रम कहलातो है, क्‍यों कि यहां पर समुदायवाची रथान शब्दका टेण ऊिय्रा ई . इन डानों अक्रारके प्रकृतिसंफ्मको आगे बतलायेंगे इस बातका शान करानेफे लिये ऋागेका सत्र कहते है-- ० बे # प्रकृतिसंक्रम श्रकृत है $ 3३. संक्रमके प्रकृतिसंक्म स्थितिसंक्रम, अनुभागसंक्रम और प्रदेशसंक्रम इन चार | 24: न




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