श्री निर्वाण लक्ष्मीपति स्तुति | Shri Nirvaan Lakshamipati Stuti

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Shri Nirvaan Lakshamipati Stuti by सुजनोत्तम वोपणा कवी - Sujnottam Vopanna Kavi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(, !६ ) ही पर का अभाव है। ऐसा स्थाद्वाद नय से जानकर केवल अपने शुद्ध स्वभाव का ही ध्यान या अनुभव करना योग्य है । देवसेन आचाय॑ ने अपने तत्वसार मे कहा है कि-- अत्थित्ति पुणो भणिया णएण ववहारि एणए सब्बे । णोकस्म कम्मणाहि पज्जाया विविहभेयगया ॥। अर्थ--व्यवहार नय से विविध प्रकार की भेद वाली नो कर्म और कर्म की पर्याये हुआ करती हैं, इस कारण उतको जीव की पर्याय कहते है । याती--संसारी जीव के कर्म बन्ध के कारण मनुष्य पशु देव नारकादि पर्याये होती है। वे पर्याये व्यवहार नय से जीव की कही गई है। ये जीव द्रव्य अपेक्षा से अभिन्न और देव मनुप्य आदि पर्यायो की अपेक्षा से भिन्‍न प्रतीत होता है । ज्ञाच, दशेन श्रादि गुणा और मनुष्यादि पर्याय समुदाय की अपेक्षा से भिन्‍त अभिन्‍त है। ऐसे आपके उपदेश से अपने स्वरूप की जो भापके समान भावना करता है, उसको मोक्ष की प्राप्ति होती है। जब तक केवल व्यवहार नय का अ्रवलम्बन लेता है तब तक इस जीव को निश्चय आत्म सुख की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए आचार्यने सम- भाया है कि इस आत्मा को अपने स्वभाव में स्थिर करके प्रभाव में भ्रमशा कराने वाले रागादि निमित्तो को दूर करता चाहिए । । इस राग परिणति रूप शुभाशुभ भावों को त्यागकर जब वहा 4 बानी झात्मा अपने अन्दर स्थिर होकर अपने श्रन्दर ही उसका




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