ईशाद्यष्टोपनिषद् | Ishadyastopanishad

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Ishadhyastopanishad by रामस्वरूप शर्मा - Ramswarup Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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के 5 हल कप भूमिका । * न. ३. + लत शिके पक कप पिप न ता करने के लिये उस पवित्र वाक्‍्यराशिके चार भाग किये ऋक्, यु, साम और अय्र्व | पथ्मय वाक्‍्यावत्ति ऋक, गीतिमय वाक्यावलि साम, ओर - शपाय्रायमय वाक्योंका नाम यजु हुआ; इस बिभागसे पहिले यह समस्त वाक्यावालि त्रगी नामते प्रसिद्ध थी, त्रयीका, हा एक अंश स्वतत्र मावसे आय नामसे प्रसिद्ध है, यही विमाग व्यसनी ने किया है, त्रगी के कर्मों . , को अपेक्षा अर्थ के कर्म सतन्त्र हैं। इसीकासुण त्रयोविषेयक्र कर्मोरमे श्रयका नामेलेख और अयवेविपयंक्र कर्मेमे त्याका नामंछेस नहीं है। ऋक्‌, यतु और साममे कर्म, उपासना और ज्ञानका वर्णन कहीं सखतस्वरूससे और.कहीं मिश्रितरुप से है, अन्तःकरणशद्धिके द्वारा प्रवृति ' मार्गते निगरत्तिम लानके निमित्त यमन यज्ञौयप्रयोगेकीमित्ति है, ऋग्ेद के मंत्र उप्त मित्तिकों सुशोमित करनेवाले चित्ररुप है और उन चित्रो्मे साम्गीतिह् मशिवक्ा सनेहुएं हैं, पल्तु वैदिक कर्मको भूमिस्म यु | मैंइ हो है, इसफारण समसे पहले यजुवेद पहितासे ही धार्मिकोंका शृह . मुशोमितर होना चाहिये । है «पे फिसी का रवाहुआ नहीं है, प्रतिकसकी आदिम परमात्मा उस का स्मरण! करे प्रमापतिके हृदयमें उपकी प्रेरण करते हैं इसीकारण « क्षिसा है क्रि-- ि ् ह , न कश्रिदेककर्तास्ति बेदस्मर्ता महेंश्व0 | ः वैद्का बनानेवाल्ता कोई नहीं है! महेश्वर उप्तका स्मए्या किया करते हैं, तइनन्तर ऋषिपम्पासे श्रवण हो होकर उस्तका प्रचार ज्ोता रहता « है, इसी कारण वेरका दूमरा,नाम भरुवि भीड़ ।वेदती आतुपूर्वां सातते एकरूप ओर अनादे है इंसीकारण पेदके अच्रोंका यधाविधे उद्यारण ज्लोनिषए ही शाल्रोक्त फल भाप्त 'छोवाड़े, इसीकारण मंत्रोंक़ा यधावत्‌ उच्चारण होनेरे ज्लिय खरोंका विन्यासत आर उच्चारण का क्रम खत- स्त्ररूप से विधिवद्ध क्ियागया डे है ि कर्म में मेहरे मेत्रोंका अर्थज्ञान केवल उच्चारणशादिके निर्मित ही जानना आवश्यक , है, मुख्य तो मंत्रोंका यपार्थरुपले उच्चारण हो | है। इंसीकरण कर्यकरे सपय वेदमत्रेकि अथैका विचारवा बर्णन महोकर ,




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