संस्कृत वाड़मय भाग - 1 | Sanskrit Vadmay Bhag - 1

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Sanskrit Vadmay Bhag - 1  by कण्ठमणि शास्त्री - Kanthamani Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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-- प्रासंगिक वक्तव्य +-- अमरमभारती के ध्ागण में संस्कृत-बाइमय का कल्पपादप स्ववीय घौरसातिध्यय से समस्त विश्वकों जो जीवन सुधा अदान करता है, उसमें विकधित शझु« पु० संस्कृत वादमय एके विश्विड श्रामोदपूर्ण पुष्प-स्तवफ़ है लो श्रॉज लगमग ७०० वर्षों से परम फल का उद्भावक माना जाने क्षया है 1 भारतीय संस्कृति के संरक्षक जगदूगुद भ्रीवल्लभाचार्य का प्रादुर्मोव और अवस्थिति ( सं. १५३५-८७ ) ठस विषम परिस्थिति में हुई थी-जब देछा में परकीय राज्यक्रान्ति का बोलबाल्य याथ्त मारतीय राष्ट्र का लोकजीबन सवंत: पीडित, आसमय, अस्त-ज्यस्व था, घर्मेझा शुद्ध स्वरूप तिरोहित-्सा दो गया या, संस्कृति अनुदिन प्लीयमाण होकर मुसूपु दोरदी थी। वैदिकघर्म ने पाखण्ड का रूप घारण फरलिया था और देश के शान्तिसुख-दायक पत्रित्न सीय॑ंस्यल, देवालय, धर्मपीठ स्वतः नष्ट श्रण् होगए ये । जनता का शासक राजन्यवर्गं पारस्परिक कलइ, बेमनस्य, कूठ एप स्वार्यलोलुप्ता से स्तीणशकि ड्लोकर पस्वक्र के द्वारा विनट्ध किया जारदायप तो सन्मार्ग-अ्रदर्शक सुघी-समाज डदरंभरी द्वोऋर अइंकाररदिमूढ केवल वादविवाद पंऊ में आ्राकण्ठ डूब चुक्ता या। मारतोय धर्म, संस्कृति, माया, वेश, आचार, विचार, समाज और जनता किस प्रलय में निशीर्ण हे जाययी १ कहा नदी जायकता था । घाख्रों का उच्छेद हे रहा था, ग्रन्थों के सप्नहालय मस्मसात्‌ किये जारदे ये | कइने का चातलयें यह कि-मारत “भारत” रहेगा या नहीं ह यद एक समस्या उठ खड़ी थी ॥ विद्ेषकर विन्ध्यका उचरीय मांग तौ जिस विनाश चक्र में फस गया था उठसे उवारनेका खामथ्यं केवल परमात्मा के दवाथ की बात हो यई थी । पुत्न ठिकंदर लोदी, बाबर और हुमाऊं का राज्यकाल 1




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