उतिष्ठत जाग्रत | Utishthat Jagrat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छाएत 1 ब! पाश्चरय दर्शन मै मद्पि उन्हें विश्लेप रुप से प्रमावित किया भा पर ग्राध्य और पास्दास्व द्ईत के दुसतात्मक अध्ययत के बाद उत्होंने हा हिल्दू शर्सन, शरैविद्यासिक युय से दिस परम साय की उपलब्धि करके, जिस स्थिर सिद्धांत पर पहुंचा है पारचात्य दार्शनिक उसका पीच-सा बागाउ मात्र पा हके हैं--पूर्ण सस्य दी उपसम्ि के महों कर सके ! बे जैंठे-बंठे यही सोचा करते कि इस विशाल सृष्टि के सुतियोबित परिच्षामम के पीछे कोई शक्ति है या सही ? मादब प्रीजद कर रद्ेश्य मठ है? संसार में इतमा बुर घोर ये शिपमतायें बयों हैं [ प्रती के महत्त के पाप् ही यरीद की जीर्च झोपड़ी स्यों है ? स्शक्तिमठ प्तामाजिक और राष्ट्रीय विपप्रठा्ों ते उसके मत को दिद्रोही इसा दिया | मरैखगाव का अन्तर पर्म-माष से परिपुर्न या । पर्म-साम को इच्छा प्ै ही थे भद्दा समाज में राने-डाते शये । धीरे-दीरे समाज कौ उपाएसा-गढ़ति के अनुसार साझंति मिराकार इष्म कौ उपासना प्रारम्म की। अरह्मसभाजियों का फ्रमुकपभ कर हिन्दू धपे की तिम्दा भी करते हूपे । आाति-मेद कौ छमातोत्रता, इजीर-नहप्ता और स्ज्री-स्वामीमता की आवह्मकता का ने बड़े चोरों से प्रभार करने शये ) घता दे कोई' परम का पूल पह्ेस्प है--'एश्िर प्राप्ठि 1 फ्॒नत गरेर ईश्वर की खोज में भ्याकुत्त हो उठे । झमेक धामिक महम्तों एवं सम्तों कौ शरण में गये पर धमा- भाम से हुआ । इसी थोड़ी में थे एक दित पहुंचे मद्टयि देवेश्गाप झदुर के पाप्त । नऐस्द्र हे उम्मत की भो्ठि महाँपि से पृष्ठा-- 'महाशम ! बया आपने एश्र का दर्जन किया है?” पर मह्रि श्मुचित उत्तर स दे सके । दे रुछ दाण हो शआारदयर्मिप्रित जाब से देखठे रहे । फिर दोले--. तुम्हारे मेत्र योबियों पैसे हैं। बरेश” दी आडा तिएशा में बदस थई। इहृवाए होकर दे सौट पढ़े। ध्याजुशता बढ़ती ही साई ) दे कमी करी अद्गड़ा उत्ये- ऐसे दत्वदर्शी यहा पृरुप बट मिर्सेम्े जो बड्मा का दर्शन करा सके । पीऐ-भीरे इह्मासमाज के शनाबरीएस से उपका मन ऊुसे मंग्रा। दे जिस धहप कौ उपशब्धपि चाहते थे, जिस अदस्पा में स्थित होमे दी चैप्टा कर रहे औै-पस्तरा उाहोंनि इप्नतमास में सर्बबा समा प्रया। घ्यात जोर अप्ययत वे बाद भरी अम्तर से जाते किस अकाठ बेदना से पीड़ित हो उस्ठा । वे कहाँ जाये ? जया करें ? जिससे ईहबर कौ प्राप्ति हो सके--पह बहाने बाला कोई रे मिप्तवा




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