शास्त्रवार्तासमुच्च्य | Sastravarta - Samuchya

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Sastravarta - Samuchya by श्री हरी बहद्रसूरी महाराज - Shri Hari Bahadrasuri Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ *. प्रस्तावना # . श्री शखेश्चरपादइवेंचाथाय नमः समग्र विश्व फो जलाशय की उपमा दी जाय तो यह निस्सदेह कहा जा सकता है-जेन दर्दान ; उसकी श्ञोभा वृद्धिगत फरने वाला कमल है जो अह॒निश हंस तुल्य मुमुक्षु वग की निरंतर उपासना का / विषय बना रहता है :और योगिवृन्द का सनोमधुकर रात-दिन जहां लीनः रहता है। कमछ: की पुखुडिया जितवी मनोहर होती है, जैन दर्शन के सिद्धान्त उनसे भी, बहुगुणित: सत्य को घुरमि से सुवासित और स्पाह्द की मनोहर आकृति से अकित होने से किसी -भी निर्मल वृद्धि अध्येता के लिये : सदा स्वंदा चित्ताकषंक़ बन्ते रहे. हैं। . ' ५ डे चर < 5 हा _ल 5५ 1 '. जन ओर'जनेतर दशन *] ' ' > 'जैसे एक ही लता पर सुमन भी खील उठते है और पत्ते मी उसी प्रकार जिन सिद्धान्तों की नींव पर जेन दर्शन की इम्रारत चुनी हुई है उन्हीं सिद्धान्तो मे से किसी (एक या दो चार को पकड “भक्कर और श्रन्यं का परित्याग कर कुछ अपनी ओर से भो जोड कर जेनेतर दर्शनों को भी अपनी अपनी इमारत चुन लो गयी है और यही कारंण है अन्य समी दर्शनों के सिद्धान्तो मे परस्पर वंषस्य * होने पर भी जैन दर्शन के साथ उनका कुछ न कुछ अंश में साम्य बना रहता है। अधिक साम्य होने “ पर भी दूसरे अनेक अंश मे उनका अंत्यंधिक वेषम्य हो जाने के कारण हो जेन दर्शन और जंनेत दर्शन । हैं मध्य महदन्तर्‌ बन जाता है । ' है 1 हैः हू ६ ६ ४ स्ू-छ शा $ 1. . 1 ४ के 8. , (ग्रन्थ राचना का; उद्दश)- थे कई कक मे हा आचार्य श्रोमद्‌ हरिभद्रसुरि महाराज ,ने शास्त्रवार्ता,समुच्चय ग्रन्थ के रूप मे एफ ऐसे सेर्दुव्रन्घ ' की रचना की है जिसके साध्यम से जनेतर दर्शन के विद्वान अपने दर्शन का अभिज्ञ होने पर आसानो - से जैनदर्शन की सिद्धान्त भुमि पर झ्राकर ' यहा बहती हूँइ सत्य फी सरिता के जले से अवगाहन फर्र #सके | ऐसी घवित्न भ्रावता से रचे गये -“हस ग्रन्थ से श्राचायश्री ने जेनेनर दर्शनों के सिद्धान्तों का प्रामाणिक निरूपण के साथ जैनदर्शंभ के मौलिक सिद्धान्तो 'का प्रमाणिक परिचय दे कर ज़िस ढंग से “झनेतर दर्शनो फे घिद्धान्तो का जेनदशेन के साथ समन्वय सम्भवित है यह प्राऊजल गौर हृदयंगम शली से'दर्शाया है 'जो सत्यजिज्ञासुओ के लिये अवश्मेव उत्सव तुल्य है। ँ हे ४६० यद॑ापि इस ग्रन्थे का उद्देश्य' सुरुय रूप से जनेतर दर्शनो का खंडन झौर जेनदर्शन का मण्डन ही रहा है किन्तु प्रस्य दर्जनों के ख़ण्डन करते समय ओआचाश्ाश्नी ने!ततक शौर घुक्तियाँ का जिस ढंग से प्रतिपादन किया है उससे यह सहज पता चल सकता है कि यह खंडन-मंडन की प्रवृत्ति स्वदर्शनराग च्औौरपर दर्शन हेष मूलक नेहीं है किन्तु शुद्ध तत्त्वे अन्वेषंण मुंडक है। 7० ४ '* हे इस प्रन्य के प्रेय्म स्तव्क में प्रारम्म में भौक्षोर्थों के लिये उपयोगी भूमिका बतायो गयो है ओर बाद में अन्य अन्य दर्शनों के शास्त्र-सिद्धान्तो की समीक्षा ओर आलोचना का उपक्रम क्रिया गया है उसमें सबसे पहले मोक्ष और मक्षोपैवींगी साधना का ही विरोधी चार्बाक-नास्तिक सिद्धान्तो का सविस्तर प्रतिकार किया, गया. हैःछः




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