नव तत्व | Nav Tatav

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Nav Tatav by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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9 २१ ) भिसके उदयसे जीव अपनी पर्याप्तियोंसे युक्त हो, उसे पर्याप्त! नामकर्म कहते हैं । (४) जिस कर्मसे एक शरीरमें एक ही जीव स्वामी रहे, उसे प्रत्येक' नामकमे कहते हैं । (५) जिस कर्मसे जीवके दाँत, हड्डी आदि अवयव मजबूत हों, उसे 'स्थिर! नामकर्म कहते हैं || (६) जिस कर्मसे जीवक्ी नामिक्रे ऊपरका भाग शुभ हो, उसे शुभ” नामकर्म कहते हैं । (७) जिस कर्मसे जीव, सबका प्रियपात्र हो, उसे “सौभाग्य” नामकर्म कहते है । (८) जिस कर्मसे जीवका स्वर [ आवाज ] केयक्ष की तरह मधुर हो, उसे 'सुस्वर! नामकर्म कहते है' । (६) जिस कर्मसे जीवका वचन लोगोंमें आदरणीब हो, उसे' आदेय” नामकर्म कहते है' , (१०) जिस कर्मसे लोगोंमें यश और कीति फैले, उसे 'यशःकोर्ति' नामकरम कहते है' ॥ १२॥ पापत्तत्त्व 1 नाणतरायद्सग, नव बीए नीअउसाय मिच्छत्त ।




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