अथर्ववेद सुबोध भाष्य तृतीय भाग | Atharvaved Subodh Bhashya Bhag 3 Kand 7 To 10

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Atharvaved Subodh Bhashya Bhag 3 Kand 7  To 10 by दामोदर सातवलेकर - Damodar Satavlekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अथवेबेदके सुभाषित *सुभावित! सवेदा ध्यामर्में घरमे योग्य वेदमत्रके मननीय विभाग हैं । ये बेदके सारमूत भा हैं। ये यहां विषयवार वर्गोकरणके साथ हर्थके प्म्तेत दिये हैं | छेखक, वक्ता, संपादक, प्रचारक, उप्देशक भ्ादिकोंके उपयोगर्में ये भच्छी चाह भा सकते हैं। इृवक्ा घारंवार पैयक्तिक अथवा सामूद्विक ठर्यारण करनेसे करनेवाों तथा सुनने- घाल्ोके मनोंपर बड़ा ह४ परिणाम दो सकता है। इससे चैदिक घमेका भरछा प्रचार हो धकठा है कौर मानवी जीवनमें वैदिक धम शानेके छिये पद पुफ सुगम साघन दो सकता है । भागेके स॒मावितोंके प्रकरणों मुएप सुमादित और उनमें जो मा वैयक्तिक अथवा सामूद्िक उच्यारणमें भा सकते हैं, ये दताये हैं। ये सुमापित अने$ हैं, इतने दी हैं ऐसी याठ नहीं भौर एक मंत्रके क्नेक शाये विभाग करनेसे ये मोर सनेश दो सकते दें। पाठक इनरू! ठए्योगस करते जायगे तो उनहझो इनको उपयथुक्तता विदित हो सझती है । बहन जम <51522..+............. को अक्षरे परमे व्योमन्‌, यस्सिन्‍्देधा अधि घि)्ये निषेदु), यस्तन्न बेद किस्नचा करिष्यति, य इत्तद्विदुस्ते अभी समाखंते (९०१८)... परम झाकाशमें रहनेवऊे ऋचाभोंके भ्क्षरोर्में व देव रदते दें । जो थद नदों जानता बढ ऋष।से क्या करेगा, जो वद्द जानते हैं वे उत्तम स्थानों विराजते हैं । इन्द्र मित्रे घरुणमग्रिमाहुरथों दिव्यः स सुफ्णों गरुत्मान्‌ , एक सत्‌ थिप्रा बहुधा चदन्ति, अर्सि यम मातरिश्वानमाहुः ( ९१०२८ )... पद दी सद्‌ है, उत्को शानी अनेक माोंत्ते बुकारते हैं, इसको इन्द्र, प्रित्र, बदग, कमरे, दिप्य, सुपक्ष, गरुमान्‌ , यम, मातरिश्वा कहते दें । ब्रह्म घोतियमामोति, बल्लिम परमेप्ठिनप्‌ ( १०३ ३१ )-- शान विद्वायकों प्राप्त करत है; ज्ञान ही परमे्ठी प्रजापाठेश्ों जानता हूँ ॥ चृतीयेन प्रह्यणा घावृघाना। ( ७११ )-- दीप बद्ा. ग्क्ष देवां अदु क्षियाति, प्रह्म दैवजनीर्दिश॥ प्रह्मेद म- ज्ञानसे बढ़ते रहते हें । घह्ीनद्‌ पिचात्‌ तपसता विपश्थित्‌ ( 4९७ )-- शानी तफ्से जाने कि थट्ट अदा दे 1 दा सुपर्णा सयुज्ञा सताया समाने चूक्षे परि पस्थ- * म्यन्नक्षत्रे, ग्रह्म सत्‌ क्षत्रप्ुच्यते ( १०१२३ ) +- मक्ष देशेंदे साथ रह०7 है, बहा दिग्प जनरूपी प्रजामें दसठा है, श्रद्मा द्वी म माध पानेवाढा है भौर ग्रद्ष दी सचा क्षात्र तेज है। जाते, तयोरम्पः पिप्पर् स्पाद्कत्ति, अनश्षप्त- प्रह्मणा भूमिर्विदिता धर्म चीदन्षरा दिता। प्रह्लेद- स्यो अभि खाकशीति ( ९९२० )-- दो उत्तम पंशषवाले मित्र वक्षी (जोव बौर गिव ) पृद् यूक्ष पर बैड हैं, उनमें पर मीठा फछ खाढा हे, दूसता म ख्ाठ। हुमा परढाधता दे । कक मूष्य तिरयक्‌ चास्तरिश्व स्थचे दितम्‌ ( १०२ २५ )-- महाने शयिदी यवावी, गहने ही पुरोद उपर रका णौ( अस्तरिक्षें प्रश्न ही दिष्टाणर चारों भोर पैड दे ।




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