संस्कृत आलोचना | Sanskrit Aalochana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम परिच्छेद विषय प्रवेश किसी भी भाषा के साहित्य की पूरी छानबीन करने के लिए उसकी आलोचना अपेक्षित होती है। विना आलोचना के काव्य के न तो गुण का परिचय मिल सकता है भौर न उसके दोषों का। गृणदोपों को बिना जाने किसी भी काव्य का आनन्द नहीं उठाया जा सकता। इमीलिए सस्क्ृत के एक कवि का कहना है कि बड़े या छोटे काधि की विशेषता जानने के लिए उसके ग्रन्थों की परीक्षा आवश्यक होती हैं। एक साधारण दीपक तया मणिदीप में क्या अन्तर होता है ? इसका परिचय विना आँघी चले नहीं ही सकता। यदि आधी किसी दीपक को बुझा देती है, तो उसे सामान्य- कोटि का दीपक जानना चाहिए । जोरो की माँची जाने पर भी जो दीपक उसी मस्ती के साय अपना प्रकाश विखेरता हुआ जरा करता है वह सावारण दीपक न होकर “मणिदोप' (मणि का दीपक) हुआ करता है। इसन्ठिए काव्य का वेशिप्ट्य समझने के लिए आलोचना की महती आवश्यकता हैं। कवि तथा आलोचक दोनो में किसका पद बडा होता है ? इस प्रव्न पर विभिन्न मत अवच्य हैँ, परन्तु भारतवर्ष में दोनो व पद एकनमान ही महत्त्वपूर्ण तवा उपादेय माना गया हैं। कवि तो काव्य का निर्माण करता है, परन्तु आलोचक हो उसके रस के जानने में, काव्य का मर्म समझने में सफल होता है जौर कमी-कनी तो एसे भावो को समझता है तथा समज्नाता हैं जो कवि को दृष्टि से भी ओमल रहते है । इस प्रकार आलोचना भारतीय साहित्य में एक अत्यन्त उपादेय विद्या है और आलोचवः का पद कवि की अपेक्षा कवमपि न्यून या घटवर नही है । सस्कृत के एफ मान्य प्राचीन आलोचक राजशंखर नो 'आलोचना- चास्त्र' को वेद का सप्तम जग मानते हूँ । उनका कथन है कि घिना उसफे स्वरूप जाने वेद के अर्थ वा ज्ञान पूरे रूप से नही हो सयता। इस प्रत्ञार यह सास्प्र बेदांग के समान ही उपयोगी तवा उसने समकनझ गाना जाना है। ८ - क




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