रामवनगमनम | Ramvangaman

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Ramvangaman by कृष्ण मोहन शास्त्री - Krishn Mohan Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रल्केण्त (०1६४० *फएच:ए हर0प4प्त | व्+ दें। का हक 5938 ट ताराचरण को गयों है। क० 1४० 4 (१८ हा का विवेचन साजतक इतनी 200९8807 7०. , 1 452४ 0 इंच के ढोममे कऋ & 8 5000 ४ 4९ 8 पे इसकी प्रशा कर रह इ। मूल्य 1२) -* दश्षकुमारचरितम्‌ घारूविवेधधिनो-वालक्रीडा सम्कृत दिन्दी टीका द्येपेतम्‌ । साहित्याचार्म प॑० ताराचरणभश्टाचाय हत बालविवोधिनी सल्कृत टोका तथा 'लक्कौडा हिन्दो टौका से थुक्त परीक्षोप्योगी यद्ध सस्करण धन सेस्करणों से रेप । विशेष क्या आप स्वय परीक्षा कर निर्णय कर सकते हैं । पूवपीछिका |) पूर्षपोठिका तथा प्रथम भौर अश्म उच्छवास २) पूर्वपोठिका तया उत्तरपीठिका का द्वितोय वरुछवास ( अपदारवर्म चरित येग्त ) भभिनद भूमिछ्ा संयोजित सर “२॥।)... सपूर्ण अन्य ४॥)' सागानन्द नांटकघ््‌ भावषाथदीपिका-संस्कृत-हिन्दी -टीकाइयोपे तम्‌ । इस श्रभिनव॒परिवर्दधित द्वितोग॒ सश्रण में ब्म्पूर्ण प्रगयकों सवोज्न पूर्ण ज्ञोगयोगी बना दिया गया है । भतिशय सर व विह्तृत भाषा टीका को प्रास्थानमें सनिवेशित छूरके प्त्येक्ष सर्मे का परीक्षोत्रयोगी सक्षिप्त हिन्दी धासार भी दे दिया यया है । द्वितीय सतकरण ३४) भ्राप्तिश्यानम--चौखस्या सस्कृत पुस्तकालय, बनारस खिटो ।




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