अमृतायन | Amratayan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : अमृतायन - Amratayan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about विद्यावती कोकिल - Vidyavati Kokil

Add Infomation AboutVidyavati Kokil

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
न्योते अनन्त क्लेश सहे द्रढ्व विन तकं। जिज्ञासा उद्गाम [ तुमको कोठि प्रणाम।मनरूपी भगवान्‌ ! कसी प्राण की रास, स्लोली अनन्त दृष्टि, दिया विवेक विधान, रच छी न्यारी सूप्टि। जग के ईइवर वाम ! तुमको कोटि प्रणामअह रूप भगवान्‌ किए सत्य के खण्ड, लखे सर््ड ही पूर्ण, हुए खण्ड हित युद्ध अन्त अतुष्ट अपूर्ण। विक्ृत बने सब काम, तुमको कोटि प्रणाम 1उदासीन भगवात्‌ | निपट समन्वयहीन मन की उठी प्रतीति, जीवन की आधार झूठ बनी सब प्रीति। उलठा जग्र-परिणाम, तुमको कोटि प्रणाम ।मन अतीत भगवान्‌ पैठे अतर देश हुई क्रिया सब बन्द, » देखे नीरब रूप टूटे जग के छंद।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now