श्री केसरियाजी तीर्थ का इतिहास | Shree Kesariyaji Tirth Ka Itihas

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Shree Kesariyaji Tirth Ka Itihas by चंदनमल नागोरी - Chandanmal Nagori
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780 KB
कुल पृष्ठ :
33
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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|हो इस के सिवाय इस मन्दिर का मध्यभाग विक्रम सम्बत १६८५ में सम्पूर्ण होने का प्रमाण मिलता है। क्योंकि शिखर के ऊपर दो कारीगरो ने मन्दिर का काम सम्पूर्ण करते समय निज की मूत्तिया चित्रकर सूत्रधार की जगह खुद का ताम लिखा है, जिन मे से एक का नाम “भगवान” दूसरे का नाम “लाधा” ओर नाम के नीचे सम्बत्‌ १६८५ भादवा विद ५ सोमवार लिखा है । इसलिये इस लेख पर से यह सिद्ध होता है कि शिखर का काम सम्बतू १६५४ में सम्पूर्ण हुवा हो । शिलालेख से तो घी इम्पीरियल गजेटोयर में लिखे मुवाफिक चौदहवी या पद्धहवी सदी में बना हो या जारी किया हो और वह अनुकूलतापूर्वक सम्वत्‌ १६८४ तक चलता रहा हो ऐसा अनुमान होता है ।मन्दिर की तामीर का ढंग देखते पाया जाता है कि मन्दिर बनवाये वाद मन्दिर के आसपास धर्मशाला के भका- नात बनवाये हो । क्योंकि हाल मे वावन जिनालय हैं उन देवरियों को देखते पाया जाता है कि देवरी आकार से उन की तामीर नही कराई गई, क्योकि उनके ऊपर उस समय का बनवाया हुवा गुम्मज मालूम नही होता, और बावन जिवालय की लाइन में सामान रखने के लिये और भण्डार के नाम से जो कोठरियां हाल में मौजूद हैं इमी मुवाकिक चारो तरफ हो ऐसा धनुमान होता है। श्रोर इस समय भी भण्डार के नाम से पहिचानी जाती हैं । उच क्ोठरियो पर ग्रुम्मज नही है और बावन जितालय पर भी धिसरनुमा या गुम्मज का कोई चिन्ह




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