यजुर्वेद भाष्य | Yajurved Bhashabhashya

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Yajurved Bhashabhashya by दयानंद सरस्वती - Dayanand Saraswati

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सब ५४१ - घोड़प्ो3४पाया ॥ ,००५१४१.>००७०७००७७०७०७००६१९०४१७ ५०७० ५०४४००४१५१११७० ७०००५२६३९१११७ पपसपपस पर प उस सरसप सनम भ ममता 17% 1... 5 ००८००: '2५००८२०#४ की (प्रधोग ) घोर उंपद्वव से रहित ( आवाप क्ाशिती ) सत्य धर्मों को प्रश्नाशित करने- हारी ( शिवा ) कल्पाणकारिणी ( तनूः ) देह वा विस्तृत उपदेशरूप नीति है ( तया ) उस ( शन्तमय ) भ्रत्यन्त छुखत प्राति कराने बाली ( तन्वा ) देह या विस्तृत उपदेश की नीति से ( नः ) हम लोगों को आप ( प्रमि; चाकशीहि ) सव शोर से शीघ्र शिक्षा क्षीजिये ॥ २॥ भांवाथः--शिक्षक लोग शिष्यों के लिये घर्मयुक्त नीति की शिक्षा दे भर पापों से पृथक्‌ करके कह्याणरुपी कर्मों के आचरण में नियुक्त करें ॥ ९॥ यामिषुमित्यस्य परमेष्ठी चा कुष्स ऋषिः । रुद्रो देवता । । विराडार््युप्रुप्‌ छुल्द। | गान्धार; सर्वर ॥ ध्ंव राजपुरुषों को क्या करना चाहिये यहं बि० ॥ थामिषु गिरिशंस्त हस्‍्तें विमष्परतवे । शिवां गिंरिश्र ता हु मा हिं५छी। पुरुष जगत्‌ ॥ १॥ ' पदाधे।--दे ( गिरिशन्त ) मेघ द्ाय खुंख पहुँचाने पाज्ते सेनापति जिस कारण तू ( प्रए्तवे ) फैकने के ढिये ( याम्‌ ) मिस ( इपुम्‌ ) वाण को ( ह॒स्ते ) हांथ में ( विभ षि) धारण करता है इसलिये ( ताम्‌ ) उस को ( शिवाम्‌ ) महलक्वारी ( कुरु) कर हे ( गिरित्र ) विद्या के उपदेशको वा मेथों की रक्षा करने हारे राजपुदप तू ( पुरुषम्‌ ) पुरुषाथेयुक्त महुष्यादि( जगत्‌ ) सेसार को ( मा ) मत ( हिसी; ) मार] ३॥ भावाथः--राजपुदषों को चाहिये कि युद्धवियां को जान और शत्र घस्त्रों को ' धारण फरके मनुध्यादि भेष्ठ प्राणियों को कक्ेश न देवें वा न मारे किन्तु भज़ल्नरूप झाल- . रण से सव की रक्ता करें ॥ ३॥ | शिवेनेत्यस्य परमेष्ठी ऋषि: । रुद्रो देवता । निन्वदार्ष्य॑नु्प छुन्दृः | गान्धार। स्व॒रः ॥ आअवब बच का छृत्य अगले मन्त्र में क० ॥ झवन बसा त्वां गिरिशाच्छा घंदामंसि। यथों ना सपीभ्ते जगद्घच्मरणसुमंना अत ॥ ४ ॥ बे €ट*ँ पदाथ;--हे ( गिरिश ) पर्वत वा मेधों में सोने चाल रोगनाशक पैचराज् तू ( छुम॑* ना; ) ्रसज्नचित्त होकर शाप ( यथा ) जैसे ( न। )हमारा,( सर्वम्‌ ) सव ( जगत ) मजुष्यादिः जन्म शोर स्थावर राज्य ( प्रयक्मम्‌ ) क्षयी भ्रादि राजरोगों थे रे




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