श्री पंचास्तिकाय संग्रह | Shri Panchastikay Sangrah

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
14 MB
कुल पष्ठ :
306
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ २३ ]विषय
कर्मोकी विचित्रता अन्य द्वारा नहीं की जाती--तत्सम्वश्धी कथननिशचयसे जीव और कर्मक्रो निज-निज रूपका ही कर्तापना होने पर भी, व्यवहारसे
जीवको कम द्वारा दिये गये फलका उपभोग विदोधको प्राप्त नहीं होता--
तत्सम्बन्धी कथनकतृ त्व ओर भोवतृत्वकी व्याख्याका उपसंहारकम संयुक्तपनेकी मुख्यतासे प्रभुत्व गुणका व्याख्यान ,फर्म वियुक्तपनेकी मुख्यतासे श्रभुत्व ग्ुणका व्याख्यानजीवके भेदो का कथन -बद्ध जीवकोी कम निमित्तक पड़विध गमन ओर मुक्त जीवको स्वाभाविक ऐसा एक
ऊध्वंगमनपुद्गल द्वव्यास्तिकायका व्यारूयान
पुद्गल द्रव्यके भेद
पुद्गल द्रव्यके भेदी का वन
स्कंघोंमें “पुदूयल ” ऐसा जो व्यवहार है.उसका समर्थन
परमाणुकी ध्याख्या ह
परमाणु भिन्त-भिन्न जातिके होनेका खण्डन
धाब्द पुद्गलस्कंधपर्याय होनेका कथन
परमाणुके एक प्रदेशीपनेका कथन
परमाणु द्रव्यमें गुएणा-पर्याय वर्ततेका कथन
स्व पुद्गल भेदी का उपसंहारधमंद्रव्यास्तिकाय और अधमंद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान
घर्माध्तिकायका स्वरूप
घंमास्तिकायका ही शेप स्वरूप
घर्माध्तिकायके गति हेतुत्व सम्बन्धी हृष्टान्त
अधम[स्तिकायका स्वरूप
घमं जोर अधघमंके सदभावको सिद्धिके लिये हैतु ै
धर्मं और अधम गति गौर स्थितिके हेतु होने पर भी उनकी भत्यन्त उदावोनता
घर्म और अधमंके उदासीनपने सम्बन्धी हेतुगाथा
६५६
श्प
६६
७०७१-७२रे
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